मैं मंदिर भी गया। पूजा भी की। सुबह जल्दी उठकर, नहा-धोकर, पूरी श्रद्धा से।
पंडित जी ने कहा, मन शांत रखिए। मैंने सिर हिला दिया। बाहर आकर सीढ़ियों पर थोड़ी देर बैठा रहा। घंटी की आवाज़ आ रही थी। लोग आ-जा रहे थे। सब कुछ वैसा ही था जैसा हमेशा होता है। बस मेरे अंदर कुछ भी हल्का नहीं हुआ।
फिर मैंने खुद को व्यस्त रखने की कोशिश की
काम में लग गया। जितना हो सकता था, उतना। ऑफिस से देर से लौटता था ताकि घर पर ज़्यादा देर अकेला न बैठना पड़े।
दोस्तों से मिला। दो-तीन बार बाहर गया। हँसी-मज़ाक भी हुआ। सच कहूँ तो उन दो-तीन घंटों में थोड़ा अच्छा भी लगा।
लेकिन रात में जब सब शांत हो जाता था, वही बात फिर सामने आ जाती थी।

बाहर से सब सामान्य दिख रहा था
घरवालों से भी बात की। माँ ने कहा, समय के साथ सब ठीक हो जाता है। शायद ठीक ही कहा होगा। सबने यही कहा।
पर मुझे समझ नहीं आया कि जब सब कुछ ठीक हो रहा है, तो अंदर से ऐसा क्यों लगता है जैसे कोई चीज़ अपनी जगह से हट गई हो और वापस नहीं बैठ रही।
कई बार मन में आया कि किसी से खुलकर कहूँ। फिर लगा, क्या कहूँगा। कोई बड़ी बात तो हुई नहीं जिसे मैं शब्दों में रख सकूँ।
एक बात बार-बार मन में आती रही
पता नहीं क्यों, मुझे लगता रहा कि शायद मेरी पूजा में कोई कमी रह गई। शायद मैंने ठीक से नहीं माँगा।
फिर एक दिन मंदिर की उन्हीं सीढ़ियों पर बैठे-बैठे लगा कि शायद बात माँगने की है ही नहीं। शायद यह दुःख इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है, और मैं उसे जबरदस्ती भगाने की कोशिश कर रहा हूँ।
मैंने सोचा, चलो आज कुछ माँगता ही नहीं। बस बैठता हूँ।
अब समझ नहीं आता
मैं यह नहीं कह रहा कि सब ठीक हो गया। ऐसा कुछ नहीं हुआ।
बस इतना हुआ कि अब मैं खुद पर नाराज़ नहीं होता कि दुःख अभी तक क्यों है। कुछ दिन भारी होते हैं, कुछ दिन थोड़े हल्के।
अगर आप भी ऐसी ही किसी जगह पर हैं, तो शायद इतना कहना काफ़ी है — जल्दी ठीक हो जाने का दबाव अपने ऊपर मत डालिए।