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बस थोड़ा और… फिर सब ठीक हो जाएगा।

बस थोड़ा और… फिर सब ठीक हो जाएगा।

15 सितंबर 2026

बस थोड़ा और... : विवेक की कहानी

एक ऐसी कहानी जो शायद आपके घर में भी चल रही है — शायद मेरे घर में भी, और शायद आपके भीतर भी।

सुनो... लेकिन इस बार सिर्फ सुनना मत। अपने आप से एक सवाल भी पूछना।

अगर कल सुबह तुम्हारे पास वही नौकरी न हो... वही पैसा न हो... वही पद न हो... वही कार न हो... तो क्या तुम फिर भी अपने परिवार की आँखों में देखकर कह पाओगे — हाँ, मैं खुश हूँ?

क्योंकि शायद जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है — हम पूरी जिंदगी उस दिन के लिए मेहनत करते रहते हैं, जिस दिन हम खुश होंगे। और उस दिन तक पहुँचते-पहुँचते, कभी-कभी वही लोग, वही रिश्ते, वही पल हमसे दूर हो चुके होते हैं, जिनके लिए हम यह सब कर रहे थे।

यह कहानी है विवेक की। लेकिन सच कहूँ, यह सिर्फ विवेक की कहानी नहीं है।


एक चमकदार शहर, एक अनथकी भागदौड़

एक नगर था — बहुत बड़ा, बहुत चमकदार। एक ऐसा शहर जहाँ रात में भी सूरज जैसा उजाला रहता था। ऊँची-ऊँची इमारतें आसमान को छूती थीं। सड़कों पर गाड़ियाँ दौड़ती थीं। मोबाइल की स्क्रीन हर चेहरे पर चमकती थी। और लोग... लोग जैसे कभी रुकते ही नहीं थे।

कोई पैसे के पीछे भाग रहा था। कोई प्रमोशन के पीछे। कोई अपनी पहचान बनाने के पीछे। कोई दूसरों से आगे निकलने के पीछे। और लगभग हर किसी के पास एक ही जवाब था — "बस थोड़ा और... बस यह लक्ष्य पूरा हो जाए... बस प्रमोशन मिल जाए... फिर जिंदगी आराम से जी लेंगे।"

उसी शहर में रहता था विवेक। तीस साल का, माँ-बाप का इकलौता बेटा। पत्नी थी अंजलि, और एक छोटी-सी बेटी — इशिता। इशिता की उम्र सिर्फ छह साल थी, और उसके लिए उसके पिता उसकी पूरी दुनिया थे। लेकिन विवेक के पास उस दुनिया के लिए समय नहीं था।

हर सुबह विवेक पाँच बजे उठता, बिना किसी को जगाए तैयार होता। अंजलि आधी नींद में उसे दरवाजे तक छोड़ने आती। इशिता अक्सर सोई रहती। विवेक उसके कमरे के दरवाजे पर कुछ सेकंड खड़ा होता — कभी उसके माथे पर हाथ रखने का सोचता, फिर मोबाइल पर आती ऑफिस की notification देखकर वापस मुड़ जाता।

ऑफिस में सुबह से रात तक — मीटिंग, कॉल, ईमेल, Target, Deadline, Pressure। और फिर रात को घर, जब तक विवेक पहुँचता, इशिता सो चुकी होती। अंजलि खाना गर्म करके रखती। विवेक खाना खाता, फिर लैपटॉप खोलता, और रात फिर शुरू हो जाती।

"तुम्हें याद है इशिता ने आखिरी बार तुम्हारे साथ कब खेला था?"

एक रात अंजलि उसके पास बैठी थी। वह बहुत देर तक कुछ नहीं बोली, फिर धीरे से बोली — "विवेक..."

विवेक ने लैपटॉप से नजर हटाए बिना कहा — "हाँ?"

अंजलि बोली — "तुम्हें याद है, इशिता ने आखिरी बार तुम्हारे साथ कब खेला था? वह रोज पूछती है — पापा मेरे साथ कब बैठेंगे?"

विवेक ने मुस्कुराने की कोशिश की — "अंजलि, बस थोड़ा और समय। प्रमोशन आने वाला है। फिर सब ठीक हो जाएगा। हम कहीं घूमने जाएँगे। इशिता के साथ खूब समय बिताऊँगा।"

अंजलि ने कुछ नहीं कहा, क्योंकि यही बात वह पिछले तीन साल से सुन रही थी।

विवेक मेहनत करता रहा, और उसकी मेहनत का परिणाम भी मिला। प्रमोशन मिला, सैलरी बढ़ी, नई कार आई, नया घर आया। ऑफिस में लोग उसकी तारीफ करने लगे। एक दिन उसके बॉस ने कहा — "विवेक, तुम बहुत अच्छा कर रहे हो। अगर अगला प्रोजेक्ट सफल रहा, तो तुम डायरेक्टर की position के लिए सबसे मजबूत candidate हो।"

विवेक की आँखों में चमक आ गई। उसे लगा — बस, अब जिंदगी बदलने वाली है।

एक जन्मदिन, एक खाली कुर्सी

उसी दिन घर में इशिता का जन्मदिन था। विवेक ने promise किया था कि वह शाम को जल्दी आएगा। इशिता ने सुबह से अपने पापा का इंतजार किया। उसने अपना छोटा-सा birthday cake खुद चुना। उसने एक drawing बनाई — उसमें एक छोटी बच्ची थी, उसके बगल में एक बड़ा आदमी था, और दोनों ने हाथ पकड़ रखा था। नीचे इशिता ने लिखा था — "मेरे पापा और मैं।"

लेकिन रात के दस बज गए। विवेक नहीं आया। ग्यारह बज गए। फिर फोन आया — "अंजलि, मुझे बहुत अफसोस है। आज project की emergency आ गई। मैं कल पक्का समय दूँगा।"

अंजलि ने फोन काट दिया। इशिता सो चुकी थी, लेकिन सोने से पहले उसने अपनी drawing तकिए के नीचे रख दी थी — शायद इस उम्मीद में कि सुबह पापा उसे देखेंगे।

कुछ दिन बाद विवेक को एक बड़ा promotion मिला। ऑफिस में तालियाँ बजीं। लोगों ने बधाई दी। किसी ने कहा — "विवेक, तुमने कर दिखाया।" विवेक मुस्कुराया।

लेकिन उस रात जब वह घर लौटा, तो घर असामान्य रूप से शांत था। इशिता के खिलौने नहीं थे। अंजलि की कुछ चीजें भी नहीं थीं। विवेक घबरा गया। तभी उसकी नजर dining table पर पड़े एक छोटे-से कागज पर गई। उस पर सिर्फ इतना लिखा था —

"हम माँ के घर जा रहे हैं। तुम सफल हो रहे हो विवेक, लेकिन हम तुम्हें खो रहे हैं।"

विवेक कुर्सी पर बैठ गया। उसने पहली बार अपने घर की खामोशी सुनी — बहुत बड़ी खामोशी, जो आवाज़ नहीं कर रही थी, लेकिन सब कुछ कह रही थी।

छत पर एक मुलाकात

उस रात विवेक छत पर चला गया। नीचे पूरा शहर रोशनी में डूबा हुआ था। हजारों खिड़कियाँ चमक रही थीं, हजारों गाड़ियाँ चल रही थीं, हजारों लोग अभी भी काम कर रहे थे। विवेक ने आसमान की तरफ देखकर पूछा — "मैंने सब कुछ तो पा लिया... फिर मैं इतना खाली क्यों हूँ?"

तभी पीछे से आवाज आई — "क्योंकि बेटा, तुमने पाने और जीने में फर्क करना बंद कर दिया है।"

विवेक ने पीछे मुड़कर देखा। बगल वाले घर की छत पर एक वृद्ध व्यक्ति खड़े थे — सफेद दाढ़ी, सादा कपड़े, शांत आँखें। वह रोज सुबह छत पर टहलते थे। विवेक ने उन्हें कई बार देखा था, लेकिन कभी बात नहीं की थी।

बाबा धीरे-धीरे उसके पास आए। बोले — "बहुत थक गए हो?"

विवेक हँसने की कोशिश करते हुए बोला — "थकना तो सफलता की कीमत है बाबा।"

बाबा मुस्कुराए — "नहीं बेटा। थकना मेहनत की कीमत हो सकता है, लेकिन अपनों को खो देना सफलता की कीमत नहीं है।"

विवेक चुप हो गया। बाबा ने पूछा — "तुम्हें पता है भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा था?" फिर उन्होंने धीरे-धीरे श्लोक बोला:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ — भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक 47

बाबा बोले — "तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि लक्ष्य मत बनाओ। इसका मतलब यह है कि लक्ष्य की चिंता में जीवन को मत खो दो।"

विवेक ने पूछा — "लेकिन बाबा, अगर मैं आगे बढ़ना चाहता हूँ तो?"

बाबा बोले — "आगे बढ़ो। बहुत आगे बढ़ो। लेकिन यह मत भूलो कि तुम्हें आगे बढ़ना किसके साथ है।"

विवेक की आँखें झुक गईं। बाबा ने फिर एक श्लोक सुनाया:

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ — भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक 50

बाबा बोले — "योगः कर्मसु कौशलम्। योग का अर्थ सिर्फ पूजा या ध्यान नहीं। कर्म करते हुए अपने भीतर संतुलन बनाए रखना भी योग है। अगर काम करते-करते तुम्हारा मन टूट जाए, अगर पैसा कमाते-कमाते तुम्हारे रिश्ते खत्म हो जाएँ, अगर दुनिया तुम्हें सफल कहे लेकिन तुम्हारी बेटी तुम्हें पहचानने से पहले सो जाए — तो बेटा, सोचना पड़ेगा कि तुम सच में सफल हो रहे हो, या सिर्फ व्यस्त हो रहे हो।"

विवेक की आँखें भर आईं। कुछ देर दोनों चुप रहे। फिर बाबा ने पूछा — "विवेक, तुम अपने मन को चलाते हो, या तुम्हारा मन तुम्हें चला रहा है?"

विवेक के पास कोई जवाब नहीं था।

बाबा बोले — "कठोपनिषद् में एक बहुत सुंदर उदाहरण है।" उन्होंने कहा:

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ — कठोपनिषद्, 1.3.3

"अपने शरीर को रथ समझो। बुद्धि को सारथी। और मन को लगाम।" फिर उन्होंने अगला मंत्र सुनाया:

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥ — कठोपनिषद्, 1.3.4

बाबा बोले — "मनुष्य का जीवन उस रथ की तरह है। इंद्रियाँ घोड़ों की तरह हैं। मन लगाम है। बुद्धि सारथी है। अगर लगाम किसी के हाथ में नहीं है, तो घोड़े तेज़ भाग सकते हैं, लेकिन रथ कहाँ जाएगा, कोई नहीं जानता।"

विवेक ने धीरे से पूछा — "तो मेरे साथ क्या हुआ?"

बाबा बोले — "तुम्हारे घोड़े बहुत तेज़ भाग रहे हैं। लेकिन तुमने सारथी को सोने दिया है।"

वापसी

विवेक पूरी रात सो नहीं पाया। सुबह उसने ऑफिस जाने के लिए कपड़े निकाले, फिर अचानक रुक गया। उसने मोबाइल उठाया, अंजलि का नंबर देखा। कई सेकंड तक फोन करने की हिम्मत नहीं हुई। फिर उसने कॉल किया।

"हैलो..." दूसरी तरफ अंजलि थी।

विवेक ने कहा — "अंजलि... मैं आ रहा हूँ।"

अंजलि चुप रही। विवेक बोला — "इस बार किसी promotion के लिए नहीं। किसी meeting के लिए नहीं। किसी target के लिए नहीं। तुम दोनों के लिए।"

जब विवेक अंजलि के मायके पहुँचा, दरवाजा खुला, और अगले ही पल इशिता दौड़ती हुई आई — "पापा!"

विवेक नीचे बैठ गया। इशिता उसकी गोद में कूद गई। विवेक ने उसे बहुत कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

इशिता ने पूछा — "पापा, अब आप हमारे साथ रहोगे?"

विवेक कुछ बोल नहीं पाया। उसने बस सिर हिला दिया।

उस दिन उसने अपनी बेटी से कोई बड़ा वादा नहीं किया। बस उसके साथ बैठकर उसकी वह पुरानी drawing देखी — वही drawing, जिसमें एक बच्ची अपने पापा का हाथ पकड़े खड़ी थी। विवेक ने drawing को सीने से लगा लिया, और पहली बार उसे समझ आया कि कुछ चीजें पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं।

एक नई परिभाषा

अगले दिन विवेक ने नौकरी नहीं छोड़ी। उसने अपने सपने भी नहीं छोड़े। उसने सिर्फ अपने सपनों की परिभाषा बदल दी।

अब वह काम करता था, लेकिन हर समय काम नहीं करता था। अब वह promotion चाहता था, लेकिन उसके लिए परिवार को नहीं खोता था। अब वह पैसा कमाता था, लेकिन पैसे को अपनी पहचान नहीं मानता था। अब वह अपनी बेटी के साथ बैठता था, उसकी बातें सुनता था। कभी homework कराता, कभी उसके साथ खेलता, कभी बिना किसी कारण बस उसे गले लगा लेता। और अंजलि धीरे-धीरे फिर से मुस्कुराने लगी।

एक दिन विवेक फिर उसी छत पर गया। बाबा वहाँ बैठे थे। विवेक ने कहा — "बाबा, आपने उस दिन मुझे बचा लिया।"

बाबा हँसे — "मैंने कुछ नहीं किया बेटा। तुम्हें सिर्फ आईना दिखाया।"

फिर बाबा ने एक और बात कही — "याद रखो, जीवन का मूल्य सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि तुमने कितना कमाया। यह भी देखना कि तुम्हारे कारण कितने लोगों के जीवन में सुख आया।" फिर उन्होंने तुलसीदास जी की पंक्ति सुनाई:

परहित सरिस धर्म नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥

अर्थात् — दूसरों के हित के समान कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं, और किसी दूसरे को पीड़ा देने के समान कोई बड़ा अधर्म नहीं।

विवेक कुछ देर चुप रहा, फिर पूछा — "तो क्या परिवार के साथ समय बिताना भी धर्म है?"

बाबा बोले — "अगर प्रेम से निभाया गया कर्तव्य है, तो क्यों नहीं?"

"पहले आप बहुत busy थे"

कुछ महीनों बाद विवेक की जिंदगी बदल चुकी थी। उसने काम करना नहीं छोड़ा था, लेकिन उसने अपनी जिंदगी को सिर्फ काम बनाना छोड़ दिया था। अब उसके ऑफिस में लोग कहते — "विवेक पहले से ज्यादा शांत है। पहले से ज्यादा focused है। पहले से ज्यादा अच्छा काम करता है।"

विवेक मुस्कुराता, क्योंकि अब उसे समझ आ गया था कि शांति काम छोड़ने से नहीं आती। शांति काम के पीछे अपना पूरा अस्तित्व छोड़ देने से बचने में आती है।

एक रविवार विवेक अपनी बेटी के साथ पार्क में बैठा था। इशिता ने उसका हाथ पकड़ रखा था। वह बोली — "पापा..."

"हाँ?"

"अब आप बहुत अच्छे पापा हो गए हो।"

विवेक मुस्कुराया। उसने पूछा — "पहले नहीं था?"

इशिता ने मासूमियत से कहा — "पहले आप बहुत busy थे।"

विवेक हँस पड़ा, लेकिन उसकी आँखें नम थीं। क्योंकि एक छह साल की बच्ची ने उसे जिंदगी का सबसे बड़ा सच बता दिया था।

जो सच शायद हम सब भूल जाते हैं

हम कहते हैं — "मैं अपने परिवार के लिए काम कर रहा हूँ।" लेकिन कभी-कभी परिवार को हमारे पैसों से ज्यादा हमारी मौजूदगी चाहिए होती है। उन्हें महँगा घर नहीं, हमारा समय चाहिए। उन्हें महँगे खिलौने नहीं, हमारा ध्यान चाहिए। उन्हें हर महीने नई चीजें नहीं, कभी-कभी बस हमारा हाथ चाहिए।

और शायद इसी कारण बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से कहते हैं:

न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।

अर्थ यह कि हम जिन लोगों और वस्तुओं को प्रिय मानते हैं, उनके पीछे भी आत्मा का ही गहरा संबंध है। इसलिए अपने भीतर को भूलकर बाहर की दुनिया को पकड़ लेना पूर्ण जीवन नहीं है।

और विवेक ने एक और बात सीखी — त्याग का मतलब हमेशा सब कुछ छोड़ देना नहीं होता। कभी-कभी त्याग का अर्थ है अपने अहंकार का त्याग, हर समय जीतने की इच्छा का त्याग, हर किसी को पीछे छोड़ने की इच्छा का त्याग। और यह समझना कि जिंदगी कोई दौड़ नहीं है, यह एक यात्रा है। ईशावास्य उपनिषद् कहता है:

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

भाव यह है — यह पूरा जगत ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए लोभ में मत डूबो। जो मिला है, उसे केवल अपना मानकर मत पकड़ो।

आज का विवेक

आज भी विवेक सुबह उठता है। काम करता है। अपने सपने देखता है। लेकिन अब, सुबह घर से निकलने से पहले, वह अपनी बेटी के कमरे में जरूर जाता है। कभी वह सो रही होती है, कभी जाग रही होती है। और अगर वह जाग रही होती है, तो विवेक उसके माथे पर हाथ रखकर कहता है — "पापा शाम को जल्दी आएँगे।" और अब वह कोशिश करता है कि वह वादा सिर्फ शब्द न रहे।

लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। क्योंकि इस शहर में आज भी हजारों विवेक हैं। हजारों लोग हैं जो कहते हैं — "बस थोड़ा और।" हजारों पति हैं जो कहते हैं — "अभी काम जरूरी है।" हजारों पत्नियाँ हैं जो इंतजार करती हैं। हजारों बच्चे हैं जो दरवाजे की तरफ देखते हैं।

और शायद आप भी उनमें से एक हैं।

एक सवाल, आपके लिए

इसलिए आज सिर्फ एक सवाल अपने आप से पूछना — जिस सफलता के पीछे तुम भाग रहे हो, अगर वह सफलता कल तुम्हें मिल भी गई, तो क्या तुम्हारे पास उसे मनाने के लिए तुम्हारे अपने लोग होंगे?

क्या तुम्हारी बेटी तुम्हारे साथ बैठेगी? क्या तुम्हारी पत्नी तुम्हारे साथ हँसेगी? क्या तुम्हारे माता-पिता तुम्हारी आवाज सुनने के लिए इंतजार करेंगे?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या तुम खुद अपने भीतर शांत रहोगे?

क्योंकि जिंदगी का सबसे बड़ा खतरा असफल होना नहीं है। सबसे बड़ा खतरा है — सफल होते-होते अपने आप को खो देना।

इसलिए मेहनत करो, बहुत मेहनत करो। सपने देखो, बड़े सपने देखो। पैसा कमाओ, सफल बनो। लेकिन अपने उन लोगों को मत खोना, जिनके चेहरे देखकर तुमने कभी सफलता का सपना देखा था।

क्योंकि आखिर में लोग तुम्हारी salary याद नहीं रखेंगे। तुम्हारी designation भी नहीं। तुम्हारी कार भी नहीं। उन्हें याद रहेगा कि तुमने उन्हें कैसा महसूस कराया था। और शायद यही असली सफलता है।


अब तुम बताओ — क्या तुम भी किसी ऐसी दौड़ में हो, जिसका अंत तुम्हें दिखाई नहीं देता? क्या तुम भी अपने परिवार से कहते हो — "बस थोड़ा और, फिर सब ठीक हो जाएगा?"

अगर हाँ, तो आज सिर्फ पाँच मिनट के लिए रुकना। मोबाइल नीचे रखना। अपने बच्चे को देखना। अपने माता-पिता को फोन करना। अपने जीवनसाथी के पास बैठना। और खुद से पूछना — मैं किसके लिए भाग रहा हूँ?

क्योंकि शायद जिंदगी हमें और तेज़ दौड़ने के लिए नहीं कह रही। शायद वह सिर्फ इतना कह रही है — थोड़ा रुक जाओ। जिसे पाने के लिए दौड़ रहे हो, कहीं ऐसा न हो कि उसे पाने के बाद तुम्हारे पास उसे बाँटने वाला कोई न बचे।

कहानी अभी खत्म नहीं हुई। क्योंकि विवेक की तरह, हम सबके पास अभी भी एक मौका है — वापस लौटने का। अपने लोगों के पास। अपने मन के पास। और सबसे बढ़कर, अपने आप के पास।

क्योंकि असली सफलता दुनिया को यह दिखाना नहीं है कि "मैं कितना आगे निकल गया।" असली सफलता शायद यह है कि एक दिन पीछे मुड़कर देखो, और कह सको —

"मैं आगे भी बढ़ा, और अपने लोगों को पीछे भी नहीं छोड़ा।"

यही शायद जिंदगी की असली जीत है।

 

कलश