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मैंने किसी का बुरा नहीं किया, फिर मेरे साथ ही इतना बुरा क्यों हुआ? कई बार भगवान से भी यही सवाल करता हूँ कि आखिर मेरी जिंदगी में ही यह सब क्यों आया। क्या इस सवाल का कोई जवाब हो सकता है?

श्लोक

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।14।।

mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ āgamāpāyino 'nityās tans-titikṣhasva bhārata

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.14

चौपाई / दोहा

लाभु हानि जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥

labhu hani jivanu maranu jasu apajasu bidhi hatha

अर्थ

लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश — ये सब विधाता के हाथ में हैं। इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।

श्रीरामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड

कथा

अर्जुन का विषाद — जब हिम्मत अचानक साथ छोड़ दे

कभी ऐसा हुआ है कि आपको किसी फैसले के बारे में पूरी तरह यकीन था और फिर अचानक वही फैसला आपके सामने आया तो हाथ-पैर जैसे ठंडे पड़ गए?

अर्जुन के साथ कुरुक्षेत्र में कुछ ऐसा ही हुआ।

युद्ध शुरू होने वाला था।

दोनों ओर सेनाएँ खड़ी थीं।

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि उनका रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें।

वे देखना चाहते थे कि उन्हें किन लोगों से युद्ध करना है।

लेकिन जब उन्होंने सामने देखा, तो बात अचानक बदल गई।

वहाँ सिर्फ दुश्मन नहीं थे।

वहाँ उनके अपने लोग थे—भीष्म, द्रोण, भाई, रिश्तेदार, मित्र और परिचित।

जिस युद्ध के लिए वे तैयार होकर आए थे, उसी युद्ध का अर्थ उनके सामने बदल गया।

उनके हाथ काँपने लगे।

मुँह सूख गया।

शरीर जैसे साथ छोड़ने लगा।

और फिर अर्जुन ने अपना गांडीव नीचे रख दिया।

उन्होंने कृष्ण से कहा—

"सीदन्ति मम गात्राणि मुखं परिशुष्यति।

"

मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है।

यह किसी कायर इंसान की बात नहीं थी।

अर्जुन योद्धा थे।

उन्होंने युद्ध देखे थे।

उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया था।

लेकिन इस बार समस्या बाहर नहीं थी।

समस्या उनके भीतर थी।

उन्हें समझ नहीं रहा था कि सही क्या है।

लड़ना सही है या अपने लोगों को बचाना?

कर्तव्य निभाना सही है या रिश्तों को बचाना?

कभी-कभी जिंदगी में भी ऐसा ही होता है।

हमें लगता है कि हमारे सामने सिर्फ दो रास्ते हैं और दोनों में कुछ कुछ खोना पड़ेगा।

अर्जुन भी उसी जगह खड़े थे।

उन्होंने आखिरकार कृष्ण से लगभग यही कहा—मैं भ्रमित हूँ।

मुझे बताइए कि मेरे लिए सही क्या है।

और यहीं से गीता की असली बातचीत शुरू होती है।

कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि "कुछ नहीं हुआ, चिंता मत करो।

"

उन्होंने उनके सवाल को गंभीरता से लिया।

उन्होंने जीवन, शरीर, मृत्यु, कर्तव्य और आत्मा के बारे में समझाना शुरू किया।

उन्होंने कहा—

"मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।

"

सुख और दुःख आते-जाते रहते हैं।

जैसे मौसम बदलते हैं, वैसे ही जीवन की परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं।

फिर कृष्ण ने अर्जुन को उस सत्य की ओर ले जाना शुरू किया जिसे वे उस समय देख नहीं पा रहे थे।

"न जायते म्रियते वा कदाचिन्\..."

जो आत्मा है, वह जन्म और मृत्यु के सामान्य अर्थों से परे है।

अर्जुन की समस्या एक ही जवाब से खत्म नहीं हुई।

कृष्ण ने उन्हें धीरे-धीरे समझाया।

और यही बात इस कहानी को इतना मानवीय बनाती है।

कभी-कभी हम भी चाहते हैं कि कोई हमें तुरंत बता दे—

"बस यह करो और सब ठीक हो जाएगा।

"

लेकिन जिंदगी हमेशा इतनी आसान नहीं होती।

कभी हमें अपने सवाल के साथ थोड़ा बैठना पड़ता है।

उसे समझना पड़ता है।

और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ता है।

अर्जुन का धनुष नीचे रखना अंत नहीं था।

वह एक ऐसी बातचीत की शुरुआत थी जिसने उनका पूरा दृष्टिकोण बदल दिया।

मुझे इस कहानी में अपने लिए क्या दिखाई देता है?

अगर कभी आप किसी बड़े फैसले के सामने खड़े होकर टूट जाएँ, अगर आपको लगे कि आप जानते ही नहीं कि क्या सही है, तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि आप कमजोर हैं।

कभी-कभी इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि परिस्थिति आपके लिए बहुत बड़ी हो गई है।

ऐसे समय में सवाल पूछना भी एक ताकत है।

अर्जुन ने सवाल पूछे।

उन्होंने अपनी उलझन छिपाई नहीं।

और उसी ईमानदारी से उन्हें आगे का रास्ता मिला।

एक बात याद रखिए

हर बार तुरंत फैसला लेना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी पहले यह स्वीकार करना जरूरी होता है—

"मुझे समझ नहीं रहा।

"

शायद यही वह जगह है जहाँ से सही बातचीत शुरू होती है।

और शायद सही बातचीत ही धीरे-धीरे हमें फिर से खड़ा करती है।

श्रीमद्भगवद्गीता · Bhagavad Gita 1-2

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मैंने किसी का बुरा नहीं किया, फिर मेरे साथ ही इतना बुरा क्यों हुआ?

कई बार भगवान से भी यही सवाल करता हूँ कि आखिर मेरी जिंदगी में ही यह सब क्यों आया।

क्या इस सवाल का कोई जवाब हो सकता है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश ये सब विधाता के हाथ में हैं।

इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक