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किसी जरूरी मीटिंग, परीक्षा या काम से पहले मेरे हाथ-पैर कांपने लगते हैं और ऐसा लगता है जैसे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो। मुझे पता होता है कि तैयारी की है, फिर भी उस समय इतनी घबराहट क्यों होती है?

श्लोक

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।

dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28

चौपाई / दोहा

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ावै साखा॥

hoihi soi jo Rama rachi rakha, ko kari tarka badhavai sakha

अर्थ

जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा — व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है। मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

गोवर्धन: जब सहारा हमारे आसपास ही हो

वृंदावन में हर साल इंद्र की पूजा होती थी।

लोगों का विश्वास था कि वर्षा होगी तो खेत अच्छे होंगे, पशुओं के लिए चारा मिलेगा और जीवन चलता रहेगा।

एक दिन बालक कृष्ण ने इस पर सवाल किया।

उन्होंने पूछा हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं?

हमारा जीवन वास्तव में किस पर टिका है?

गांव वाले जिस भूमि पर रहते हैं, जिस गोवर्धन पर्वत से उन्हें चारा और आश्रय मिलता है, जिन गायों पर उनका जीवन निर्भर है क्या हमें इनके प्रति कृतज्ञ नहीं होना चाहिए?

कृष्ण की बात लोगों को समझ आई और उन्होंने गोवर्धन की पूजा की।

इंद्र को यह अच्छा नहीं लगा।

कथा के अनुसार उन्होंने भयंकर वर्षा शुरू कर दी।

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

गांव वालों को डर लगने लगा कि उनके घर, पशु और पूरा जीवन पानी में बह जाएगा।

तभी कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को उसके नीचे आश्रय दिया।

लोग वहां इकट्ठा हो गए।

कोई अकेला नहीं रहा।

हर व्यक्ति दूसरे के साथ खड़ा था।

कथा कहती है कि सात दिन तक कृष्ण ने पर्वत को थामे रखा और अंततः इंद्र का क्रोध शांत हुआ।

इस कहानी को सिर्फ चमत्कार के रूप में देखना आसान है।

लेकिन इसके भीतर एक बहुत मानवीय बात भी है।

मुश्किल समय में हमें अक्सर लगता है कि हमें खुद ही सब संभालना पड़ेगा।

जब घर में बीमारी आती है।

जब अचानक नौकरी चली जाती है।

जब परिवार पर आर्थिक संकट आता है।

जब कोई बड़ी परेशानी सामने खड़ी हो जाती है।

मन सबसे पहले यही कहता है अब मैं क्या करूंगा?

गोवर्धन की कहानी में गांव वाले अकेले नहीं थे।

वे एक साथ आए।

एक ही जगह खड़े हुए।

एक-दूसरे का सहारा बने।

और शायद यही इस कहानी का सबसे सुंदर हिस्सा है।

हर संकट में कोई चमत्कार हो, यह जरूरी नहीं।

लेकिन संकट में किसी का हाथ मिल जाए, किसी का कंधा मिल जाए, किसी का साथ मिल जाए वह भी बहुत बड़ा सहारा होता है।

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आपका प्रश्न “किसी जरूरी मीटिंग, परीक्षा या काम से पहले मेरे हाथ-पैर कांपने लगते हैं और ऐसा लगता है जैसे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो।

मुझे पता होता है कि तैयारी की है, फिर भी उस समय इतनी घबराहट क्यों होती है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है।

मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है मुश्किल समय में अपने आसपास मौजूद सहारे को पहचानना भी जरूरी है।

हर समस्या अकेले उठानी जरूरी नहीं।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

मुश्किल समय में अपने आसपास मौजूद सहारे को पहचानना भी जरूरी है। हर समस्या अकेले उठानी जरूरी नहीं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक