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आजकल लोगों से मिलना, बातें करना और यहां तक कि किसी के सामने हंसकर बैठना भी मुझे थका देता है। घर आने के बाद किसी से बात करने का मन नहीं करता। मुझे लगता है कि मैं लोगों से नहीं, खुद से भी थक गया हूँ।
श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47
चौपाई / दोहा
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
Ram kaju kinhen binu mohi kahan bisram
अर्थ
जब तक कार्य पूरा न हो, विश्राम कैसा — कर्तव्य पूरा किए बिना रुकना उचित नहीं।
श्रीरामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड
कथा
जब भी धर्म का क्षय होता है
अर्जुन जब अपने सामने खड़े युद्ध और अपने कर्तव्य के बीच उलझ गए थे, तब कृष्ण ने उन्हें धर्म के बारे में समझाना शुरू किया।
इसी बातचीत में कृष्ण कहते हैं—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”
जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
फिर वे आगे कहते हैं—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
सज्जनों की रक्षा, दुष्ट कर्म करने वालों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
अर्जुन के लिए यह सिर्फ ईश्वर के प्रकट होने की बात नहीं थी।
उनकी अपनी उलझन भी यही थी—
सही क्या है?
अपने लोगों को बचाना सही है?
या अन्याय के सामने खड़ा होना?
परिवार बचाना धर्म है?
या न्याय के लिए संघर्ष करना?
जब हम किसी कठिन परिस्थिति में होते हैं, तब हमें भी कभी-कभी लगता है कि सही और गलत की रेखा साफ नहीं रही।
ऐसे समय में हम पूरी दुनिया का भार अपने सिर पर ले लेते हैं।
लगता है कि हर चीज मुझे ही ठीक करनी है।
हर व्यक्ति को समझाना है।
हर समस्या का समाधान मुझे ही निकालना है।
लेकिन शायद हमारा काम पूरी दुनिया को ठीक करना नहीं है।
हमारा काम है अपने हिस्से का सही काम पहचानना।
अर्जुन को भी आखिरकार यही करना था।
उन्हे पूरे संसार का भविष्य अपने हाथ में नहीं लेना था।
उन्हें अपना कर्तव्य समझना था और उसके अनुसार कर्म करना था।
मुझे इससे क्या सीखना है?
मेरा काम पूरी दुनिया को ठीक करना नहीं है।
मेरा काम है—जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहाँ अपना सही कदम पहचानना।
अब मुझे क्या करना है?
जिस उलझन में मैं आज फंसा हूँ, उसमें पूरी समस्या को एक साथ हल करने की कोशिश नहीं करनी है।
बस खुद से पूछना है—
“इस समय मेरे हिस्से का सही काम क्या है?
”
और फिर उसी पर ध्यान देना है।
श्रीमद्भगवद्गीता
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “आजकल लोगों से मिलना, बातें करना और यहां तक कि किसी के सामने हंसकर बैठना भी मुझे थका देता है।
घर आने के बाद किसी से बात करने का मन नहीं करता।
मुझे लगता है कि मैं लोगों से नहीं, खुद से भी थक गया हूँ।
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जब तक कार्य पूरा न हो, विश्राम कैसा — कर्तव्य पूरा किए बिना रुकना उचित नहीं।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

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- “मैं रात में ठीक से सोता हूँ, फिर भी सुबह उठने के बाद ऐसा लगता है जैसे शरीर और मन दोनों आराम नहीं कर पाए। दिन शुरू होने से पहले ही थका हुआ महसूस करता हूँ। क्या हर थकान सिर्फ शरीर की होती है?”
- “पहले जिस काम को लेकर मेरे अंदर जोश रहता था, अब वही काम शुरू करने का मन नहीं करता। काम करता हूँ लेकिन बस किसी तरह पूरा करता हूँ। क्या यह सिर्फ आलस है या मैं अंदर से बहुत थक चुका हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
