यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
मेरे दोस्त की सफलता देखकर मैं उसके लिए खुश होना चाहता हूँ, लेकिन सच कहूँ तो अंदर से जलन होती है। फिर मुझे अपने ही इस भाव पर शर्म आती है क्योंकि मैं उसके खिलाफ कुछ चाहता भी नहीं। मैं इस भावना को कैसे समझूँ?
श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham
श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7
चौपाई / दोहा
जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥
jaki rahi bhavana jaisi, prabhu murati dekhi tina taisi
अर्थ
जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है। बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
द्रौपदी की पुकार: जब कोई साथ देने वाला न दिखे
जुए की सभा में सब कुछ हार जाने के बाद द्रौपदी को जबरन सभा में लाया गया।
सामने वही लोग बैठे थे जिन्हें वह अपना मानती थीं।
बड़े-बड़े योद्धा, बुज़ुर्ग, गुरु और उनके अपने पति — सब वहीं थे।
लेकिन उस समय सबसे ज्यादा डराने वाली चीज़ सिर्फ वह अन्याय नहीं था जो उनके सामने हो रहा था।
सबसे ज्यादा तकलीफ शायद यह थी कि इतने लोगों के बीच भी वह अकेली खड़ी थीं।
द्रौपदी ने सवाल किया।
उन्होंने पूछा कि जब युधिष्ठिर पहले ही स्वयं को हार चुके थे, तो क्या उन्हें उसके बाद भी द्रौपदी को दांव पर लगाने का अधिकार था?
कोई साफ जवाब नहीं आया।
सोचिए, किसी इंसान के लिए वह क्षण कितना भारी रहा होगा।
सामने इतने लोग हों, फिर भी कोई आपके लिए खड़ा न हो।
आप बोल रहे हों, सवाल कर रहे हों, लेकिन जैसे आपकी आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस आ रही हो।
फिर स्थिति और कठिन हो गई।
द्रौपदी ने बाहर से मिलने वाले हर सहारे को टूटता हुआ देखा।
और आखिर में उन्होंने कृष्ण को पुकारा।
यहाँ कहानी का सबसे गहरा हिस्सा शुरू होता है।
उनकी पुकार सिर्फ किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं थी।
वह उस क्षण की पुकार थी जब इंसान कहता है — अब मैं अकेले नहीं संभाल पा रही।
महाभारत की परंपरा में इसके बाद वस्त्र बढ़ते जाने और दुःशासन के थक जाने की कथा आती है।
जो अपमान द्रौपदी को तोड़ने के लिए किया जा रहा था, वही अंततः उसके सामने टिक नहीं पाया।
लेकिन इस कहानी को सिर्फ चमत्कार की कहानी बनाकर देखना शायद इसके मानवीय पक्ष को छोटा कर देना होगा।
कभी-कभी जिंदगी में भी ऐसा ही होता है।
हम किसी रिश्ते में होते हैं और अचानक सामने वाला हमारा साथ छोड़ देता है।
परिवार में कोई बात होती है और हमें लगता है कि कोई हमारी बात समझ ही नहीं रहा।
नौकरी में अन्याय होता है और आसपास के लोग चुप रहते हैं।
कभी-कभी हम अपने ही लोगों के बीच खड़े होकर सोचते हैं — आखिर मेरी बात सुनेगा कौन?
द्रौपदी का सवाल हमें यह याद दिलाता है कि अपनी गरिमा के लिए सवाल पूछना गलत नहीं है।
हर बात चुपचाप सह लेना धैर्य नहीं होता।
और मदद मांगना कमजोरी नहीं है।
महाभारत · Linked wisdom: to be verse-verified — Mahabharata, Sabha Parva | Evidence: traditional | Topics: विश्वासघात, न्याय, अन्याय
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मेरे दोस्त की सफलता देखकर मैं उसके लिए खुश होना चाहता हूँ, लेकिन सच कहूँ तो अंदर से जलन होती है।
फिर मुझे अपने ही इस भाव पर शर्म आती है क्योंकि मैं उसके खिलाफ कुछ चाहता भी नहीं।
मैं इस भावना को कैसे समझूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है।
बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — अगर किसी कठिन परिस्थिति में मुझे लग रहा है कि कोई मेरा साथ नहीं दे रहा, तो मुझे अपनी आवाज़ पूरी तरह बंद नहीं करनी है।
अपनी बात कहना, मदद मांगना और अन्याय को अन्याय कहना भी साहस है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
अगर किसी कठिन परिस्थिति में मुझे लग रहा है कि कोई मेरा साथ नहीं दे रहा, तो मुझे अपनी आवाज़ पूरी तरह बंद नहीं करनी है। अपनी बात कहना, मदद मांगना और अन्याय को अन्याय कहना भी साहस है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “कभी-कभी लगता है कि मैं जितनी मेहनत करता हूँ, उतनी मेहनत के बिना ही दूसरे लोग मुझसे आगे निकल जाते हैं। फिर मन में गुस्सा और तुलना दोनों शुरू हो जाते हैं। मैं बार-बार दूसरों की जिंदगी से अपनी जिंदगी को क्यों नापता हूँ?”
- “सोशल मीडिया खोलता हूँ तो किसी की नई गाड़ी, किसी की नौकरी, किसी की शादी और किसी की यात्रा दिखाई देती है। थोड़ी देर बाद अपनी ही जिंदगी छोटी लगने लगती है। क्या सच में मेरी जिंदगी पीछे है या मैं सिर्फ दूसरों की दिखाई हुई जिंदगी से तुलना कर रहा हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
