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मैंने जो गलती की थी उसके लिए सामने वाले ने मुझे माफ कर दिया, लेकिन मैं खुद को आज तक माफ नहीं कर पाया। बात कई साल पुरानी है, फिर भी कभी-कभी वही घटना याद आती है और लगता है कि मैं बहुत गलत इंसान हूँ। ऐसा क्यों होता है?
श्लोक
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।
dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati
श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28
चौपाई / दोहा
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula
अर्थ
मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
विश्वामित्र: जब गिरने के बाद फिर से शुरू करना पड़े
विश्वामित्र मूल रूप से एक राजा थे।
फिर उन्होंने एक बड़ा लक्ष्य चुना — तपस्या करके ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त करना।
उन्होंने अपना जीवन बदल दिया।
तपस्या शुरू की।
लंबे समय तक साधना की।
लेकिन जैसे-जैसे उनका तप बढ़ता गया, उनकी परीक्षा भी बढ़ती गई।
कथा में आता है कि मेनका को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा गया।
विश्वामित्र उनके आकर्षण में पड़ गए।
उनका ध्यान अपने लक्ष्य से हट गया।
समय बीतता गया।
फिर एक दिन उन्हें एहसास हुआ कि वे अपने रास्ते से बहुत दूर निकल चुके हैं।
अब उनके सामने दो रास्ते थे।
एक — खुद को असफल मानकर सब छोड़ देना।
दूसरा — वापस लौटना।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
उन्होंने मेनका से विदा ली और फिर तपस्या में लौट गए।
इस बार वे पहले से ज्यादा सावधान थे।
उन्होंने अपने भीतर की कमजोरी को पहचाना था।
और शायद यही बात उनकी कहानी को हमारे लिए उपयोगी बनाती है।
हम असफल होते हैं तो अक्सर सोचते हैं —
"अब क्या फायदा?
"
"मैं फिर वही गलती करूंगा।
"
"इतना समय खराब कर दिया।
"
लेकिन गलती के बाद लौटना भी एक तरह की शक्ति है।
अगर कोई व्यक्ति दस साल से गलत दिशा में जा रहा है और ग्यारहवें साल सही रास्ते पर लौट आता है, तो उसके पहले दस साल वापस नहीं आएंगे।
लेकिन उसका बाकी जीवन बदल सकता है।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata / Ramayana traditions — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: प्रलोभन, पुनः प्रयास, आत्मसंशय
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मैंने जो गलती की थी उसके लिए सामने वाले ने मुझे माफ कर दिया, लेकिन मैं खुद को आज तक माफ नहीं कर पाया।
बात कई साल पुरानी है, फिर भी कभी-कभी वही घटना याद आती है और लगता है कि मैं बहुत गलत इंसान हूँ।
ऐसा क्यों होता है?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।
पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — भटक जाना और हमेशा के लिए हार जाना एक ही बात नहीं है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
भटक जाना और हमेशा के लिए हार जाना एक ही बात नहीं है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “किसी अपने को मुश्किल समय से गुजरते देखकर मुझे लगता है कि शायद इसकी वजह मैं हूँ, जबकि सच यह है कि परिस्थितियां पूरी तरह मेरे हाथ में भी नहीं थीं। फिर भी मन बार-बार खुद को दोष देता है। यह अपराधबोध कैसे समझूँ?”
- “आजकल किसी को मना कर दूँ, अपने लिए थोड़ा समय निकाल लूँ या किसी की मदद न कर पाऊँ तो तुरंत अपराधबोध होने लगता है। ऐसा लगता है कि मैं स्वार्थी हो रहा हूँ। क्या हर बार दूसरों को प्राथमिकता न देना गलत है?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
