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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

बचपन में मेरे साथ या मुझसे जुड़ी एक बात हुई थी जिसे मैं आज भी याद करके शर्मिंदा हो जाता हूँ। बाकी लोग शायद उसे भूल चुके हैं, लेकिन मेरे अंदर वह बात अभी भी जिंदा है। क्या पुरानी शर्म को सच में छोड़ा जा सकता है?

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥

Par updes kusal bahutere, je acharahin te nar na ghanere

अर्थ

दूसरों को उपदेश देने में सब कुशल हैं, पर स्वयं आचरण करने वाले थोड़े ही हैं।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

विश्वामित्र: जब गिरने के बाद फिर से शुरू करना पड़े

विश्वामित्र मूल रूप से एक राजा थे।

फिर उन्होंने एक बड़ा लक्ष्य चुना तपस्या करके ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त करना।

उन्होंने अपना जीवन बदल दिया।

तपस्या शुरू की।

लंबे समय तक साधना की।

लेकिन जैसे-जैसे उनका तप बढ़ता गया, उनकी परीक्षा भी बढ़ती गई।

कथा में आता है कि मेनका को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा गया।

विश्वामित्र उनके आकर्षण में पड़ गए।

उनका ध्यान अपने लक्ष्य से हट गया।

समय बीतता गया।

फिर एक दिन उन्हें एहसास हुआ कि वे अपने रास्ते से बहुत दूर निकल चुके हैं।

अब उनके सामने दो रास्ते थे।

एक खुद को असफल मानकर सब छोड़ देना।

दूसरा वापस लौटना।

उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

उन्होंने मेनका से विदा ली और फिर तपस्या में लौट गए।

इस बार वे पहले से ज्यादा सावधान थे।

उन्होंने अपने भीतर की कमजोरी को पहचाना था।

और शायद यही बात उनकी कहानी को हमारे लिए उपयोगी बनाती है।

हम असफल होते हैं तो अक्सर सोचते हैं

"अब क्या फायदा?

"

"मैं फिर वही गलती करूंगा।

"

"इतना समय खराब कर दिया।

"

लेकिन गलती के बाद लौटना भी एक तरह की शक्ति है।

अगर कोई व्यक्ति दस साल से गलत दिशा में जा रहा है और ग्यारहवें साल सही रास्ते पर लौट आता है, तो उसके पहले दस साल वापस नहीं आएंगे।

लेकिन उसका बाकी जीवन बदल सकता है।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata / Ramayana traditions — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: प्रलोभन, पुनः प्रयास, आत्मसंशय

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “बचपन में मेरे साथ या मुझसे जुड़ी एक बात हुई थी जिसे मैं आज भी याद करके शर्मिंदा हो जाता हूँ।

बाकी लोग शायद उसे भूल चुके हैं, लेकिन मेरे अंदर वह बात अभी भी जिंदा है।

क्या पुरानी शर्म को सच में छोड़ा जा सकता है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है दूसरों को उपदेश देने में सब कुशल हैं, पर स्वयं आचरण करने वाले थोड़े ही हैं।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है भटक जाना और हमेशा के लिए हार जाना एक ही बात नहीं है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

भटक जाना और हमेशा के लिए हार जाना एक ही बात नहीं है।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक