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जब लोगों को मेरी असफलता के बारे में पता चलता है तो उनसे नजर मिलाने में भी अजीब-सी शर्म महसूस होती है। मुझे लगता है कि वे मुझे पहले जैसा सम्मान नहीं देंगे। मैं दूसरों की नजरों का इतना डर क्यों रखने लगा हूँ?

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥

jaki rahi bhavana jaisi, prabhu murati dekhi tina taisi

अर्थ

जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है। बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

अश्वत्थामा हतः: जब सही और गलत के बीच रास्ता साफ न हो

महाभारत का युद्ध आगे बढ़ रहा था।

द्रोणाचार्य पांडवों के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुके थे।

वे इतने कुशल योद्धा थे कि उन्हें रोकना मुश्किल हो रहा था।

युद्ध चलता रहा और दोनों तरफ बड़ी संख्या में लोग मारे जा रहे थे।

तब कृष्ण ने एक कठिन उपाय सुझाया।

अगर द्रोणाचार्य को यह विश्वास हो जाए कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया है, तो शायद वे शस्त्र छोड़ दें।

लेकिन समस्या यह थी कि युधिष्ठिर के लिए सत्य बहुत महत्वपूर्ण था।

उनकी पहचान ही सत्य से जुड़ी थी।

फिर भी परिस्थिति ऐसी थी कि उन्हें एक निर्णय लेना था।

भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मार दिया और घोषणा की "अश्वत्थामा मारा गया।

"

द्रोणाचार्य को विश्वास नहीं हुआ।

उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा।

उन्हें भरोसा था कि युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलेंगे।

युधिष्ठिर के सामने अब कोई आसान रास्ता नहीं था।

एक तरफ युद्ध था।

दूसरी तरफ उनका अपना सिद्धांत।

उन्होंने कहा "अश्वत्थामा हतः" अश्वत्थामा मारा गया।

फिर धीमे स्वर में कहा "नरो वा कुञ्जरो वा" मनुष्य था या हाथी।

कथा के अनुसार उस समय शोर के कारण द्रोणाचार्य ने केवल पहला हिस्सा सुना।

उन्होंने अपने पुत्र की मृत्यु मान ली और शस्त्र छोड़ दिए।

यह घटना युधिष्ठिर के लिए भी आसान नहीं रही।

क्योंकि कभी-कभी इंसान ऐसा निर्णय लेता है जिसमें उसे लगता है कि उसने परिस्थिति के लिए जो जरूरी था, वह किया लेकिन मन फिर भी पूरी तरह शांत नहीं होता।

यही इस कहानी की असली ताकत है।

यह हमें कोई आसान उत्तर नहीं देती।

यह नहीं कहती कि हर कठिन परिस्थिति में झूठ बोलना सही है।

और यह भी नहीं कहती कि हर परिस्थिति में एक ही नियम लागू किया जा सकता है।

यह हमें उस जगह खड़ा करती है जहां हर विकल्प की अपनी कीमत है।

हमारी जिंदगी में भी ऐसे क्षण आते हैं।

ऑफिस में कोई गलती हुई है और सच बताने पर किसी और को नुकसान हो सकता है।

परिवार में कोई ऐसा निर्णय लेना है जिसमें एक व्यक्ति खुश होगा और दूसरा दुखी।

कभी किसी अपने को बचाने के लिए कुछ छिपाने का मन करता है।

ऐसे समय में हम सिर्फ यह नहीं पूछ सकते कि "मेरे लिए आसान क्या है?

"

हमें यह भी पूछना पड़ता है "इस निर्णय की जिम्मेदारी क्या मैं बाद में भी उठा पाऊंगा?

"

Linked wisdom: "अश्वत्थामा हतः..." — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: सत्य, असत्य, अपराधबोध

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जब लोगों को मेरी असफलता के बारे में पता चलता है तो उनसे नजर मिलाने में भी अजीब-सी शर्म महसूस होती है।

मुझे लगता है कि वे मुझे पहले जैसा सम्मान नहीं देंगे।

मैं दूसरों की नजरों का इतना डर क्यों रखने लगा हूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है।

बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर नैतिक दुविधा का जवाब काला या सफेद नहीं होता।

लेकिन अपने निर्णय की जिम्मेदारी से भागना भी समाधान नहीं है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर नैतिक दुविधा का जवाब काला या सफेद नहीं होता। लेकिन अपने निर्णय की जिम्मेदारी से भागना भी समाधान नहीं है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक