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जब लोगों को मेरी असफलता के बारे में पता चलता है तो उनसे नजर मिलाने में भी अजीब-सी शर्म महसूस होती है। मुझे लगता है कि वे मुझे पहले जैसा सम्मान नहीं देंगे। मैं दूसरों की नजरों का इतना डर क्यों रखने लगा हूँ?
श्लोक
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5
चौपाई / दोहा
पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
Par updes kusal bahutere, je acharahin te nar na ghanere
अर्थ
दूसरों को उपदेश देने में सब कुशल हैं, पर स्वयं आचरण करने वाले थोड़े ही हैं।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
शिव धनुष: जब असंभव सामने खड़ा हो
मिथिला में सीता स्वयंवर की तैयारी थी।
दूर-दूर से राजा और राजकुमार आए थे।
सब जानते थे कि यह कोई साधारण स्वयंवर नहीं है।
राजा जनक ने एक कठिन शर्त रखी थी — जो शिव के विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सके, वही सीता का वरण करेगा।
धनुष सभा के बीच रखा था।
उसे देखकर ही अंदाज़ा हो जाता था कि यह काम आसान नहीं होने वाला।
एक-एक करके बड़े-बड़े राजा आगे आए।
किसी ने उसे उठाने की कोशिश की।
किसी ने पूरी ताकत लगा दी।
किसी ने प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया।
लेकिन कोई सफल नहीं हुआ।
धीरे-धीरे सभा में एक अजीब-सी चुप्पी आने लगी।
जब इतने शक्तिशाली लोग असफल हो गए, तो बाकी लोग कोशिश करने से पहले ही अपने मन में हारने लगे।
यही तो हमारे साथ भी होता है।
हम किसी काम को इसलिए असंभव मान लेते हैं क्योंकि हमने देखा है कि दूसरे लोग उसमें असफल हुए हैं।
फिर राम आगे बढ़े।
न कोई दिखावा।
न कोई घोषणा।
न यह साबित करने की कोशिश कि मैं सबसे शक्तिशाली हूं।
वे शांत भाव से धनुष के पास गए।
उन्होंने उसे उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया।
धनुष टूट गया।
पूरी सभा स्तब्ध रह गई।
राम ने कोई विजय-घोष नहीं किया।
जैसे उन्होंने कुछ असाधारण किया ही न हो।
मुझे इस कहानी में सबसे सुंदर बात यही लगती है।
कभी-कभी हमारा सबसे बड़ा अवरोध सामने खड़ी कठिनाई नहीं होती।
हमारे मन में पहले से बनी हुई वह धारणा होती है कि "यह मेरे बस का नहीं है।
"
नौकरी के लिए आवेदन करने से पहले ही लगता है कि मुझे कौन चुनेगा।
व्यवसाय शुरू करने से पहले लगता है कि मेरे पास दूसरों जितने पैसे नहीं हैं।
किसी रिश्ते में अपनी बात कहने से पहले लगता है कि सामने वाला समझेगा ही नहीं।
और धीरे-धीरे हम कोशिश करना ही छोड़ देते हैं।
राम की कहानी यह नहीं कहती कि हर असंभव काम हम कर सकते हैं।
वह बस इतना याद दिलाती है कि दूसरों की सीमा हमेशा हमारी सीमा नहीं होती।
Linked wisdom: to be verse-verified — Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Bala Kanda | Evidence: traditional | Topics: आत्मसंशय, उद्देश्यहीनता, साहस
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “जब लोगों को मेरी असफलता के बारे में पता चलता है तो उनसे नजर मिलाने में भी अजीब-सी शर्म महसूस होती है।
मुझे लगता है कि वे मुझे पहले जैसा सम्मान नहीं देंगे।
मैं दूसरों की नजरों का इतना डर क्यों रखने लगा हूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — दूसरों को उपदेश देने में सब कुशल हैं, पर स्वयं आचरण करने वाले थोड़े ही हैं।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — जिस काम को मैं असंभव मानकर बैठा हूं, उसके बारे में एक बार ईमानदारी से देखना है — क्या वह सचमुच असंभव है, या मैंने कोशिश करने से पहले ही अपने लिए फैसला कर लिया है?
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
जिस काम को मैं असंभव मानकर बैठा हूं, उसके बारे में एक बार ईमानदारी से देखना है — क्या वह सचमुच असंभव है, या मैंने कोशिश करने से पहले ही अपने लिए फैसला कर लिया है?

ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “अपनी किसी कमजोरी या पुरानी गलती के बारे में सोचता हूँ तो इतनी शर्म महसूस होती है कि किसी से उसके बारे में बात करने की हिम्मत नहीं होती। डर लगता है कि अगर लोगों को सच पता चल गया तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”
- “मैं मंदिर भी गया, पूजा भी की, दोस्तों से भी मिला और खुद को काम में व्यस्त रखने की कोशिश भी की। सब कहते हैं समय के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन अंदर का दुःख कम ही नहीं हो रहा। मैं आखिर क्या करूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
