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मैं समझता हूँ कि जिस इंसान से मैं नफरत करता हूँ, उसके बारे में सोचते रहना मुझे ही अंदर से जला रहा है। फिर भी मन उसे माफ करने के लिए तैयार नहीं होता। क्या आगे बढ़ने के लिए माफ करना जरूरी है?

श्लोक

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।

krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63

चौपाई / दोहा

परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

parahita sarisa dharama nahin bhai, para pira sama nahin adhamai

अर्थ

दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं। मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

हर हृदय में बैठा हुआ

गीता के दसवें अध्याय में अर्जुन कृष्ण से उनके वास्तविक स्वरूप के बारे में सुन रहे हैं।

कृष्ण उन्हें बताते हैं कि संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ, सुंदर और प्रभावशाली है, उसमें उनकी एक झलक देखी जा सकती है।

और फिर एक बहुत व्यक्तिगत बात कहते हैं—

“अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।

मैं, हे अर्जुन, सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।

फिर कृष्ण कहते हैं—

“अहमादिश्च मध्यं भूतानामन्त एव च।

मैं ही सभी प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।

यह बात अर्जुन के लिए शायद इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि वे कृष्ण को अपने सारथी के रूप में जानते थे।

लेकिन कृष्ण उन्हें अपने उस रूप की ओर देखने को कह रहे थे जो सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है।

हम भी कई बार ईश्वर या किसी बड़ी आध्यात्मिक सच्चाई को अपने से बहुत दूर समझते हैं।

मंदिर में।

किसी तीर्थ में।

किसी किताब में।

किसी दूसरे व्यक्ति के अनुभव में।

लेकिन गीता का यह विचार खोज की दिशा बदल देता है।

अगर वही चेतना हर हृदय में है, तो फिर खोज सिर्फ बाहर की यात्रा नहीं रह जाती।

वह भीतर की यात्रा भी बन जाती है।

इसका मतलब यह नहीं कि हमारे सारे सवाल उसी क्षण खत्म हो जाते हैं।

“मैं कौन हूँ?

“ईश्वर है या नहीं?

“जीवन का अर्थ क्या है?

इन सवालों के जवाब हमेशा एक लाइन में नहीं मिलते।

लेकिन सवाल पूछने का तरीका बदल सकता है।

शायद हमें हर उत्तर बाहर खोजने के बजाय कभी-कभी अपने भीतर भी देखना चाहिए।

मुझे इससे क्या सीखना है?

जिसे मैं बाहर खोज रहा हूँ, हो सकता है उसकी कोई झलक मेरे भीतर भी मौजूद हो।

अब मुझे क्या करना है?

आज कुछ मिनट बिना किसी फोन, शोर या जल्दबाजी के शांत बैठना है।

कुछ हासिल नहीं करना।

कुछ साबित नहीं करना।

बस अपने भीतर उठ रहे विचारों को देखना है।

और खुद से पूछना है—

“मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?

श्रीमद्भगवद्गीता

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मैं समझता हूँ कि जिस इंसान से मैं नफरत करता हूँ, उसके बारे में सोचते रहना मुझे ही अंदर से जला रहा है।

फिर भी मन उसे माफ करने के लिए तैयार नहीं होता।

क्या आगे बढ़ने के लिए माफ करना जरूरी है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।

मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक