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बाहर से मेरी जिंदगी ठीक दिखती है---घर है, काम है, रिश्ते हैं और बहुत-सी ऐसी चीज़ें हैं जिनके लिए लोग मुझे भाग्यशाली कहेंगे। फिर भी जब मैं अकेला बैठता हूँ तो अंदर एक खाली जगह महसूस होती है। आखिर यह खालीपन किस चीज़ का है?
श्लोक
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।20।।
na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato 'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.20
चौपाई / दोहा
लाभु हानि जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥
labhu hani jivanu maranu jasu apajasu bidhi hatha
अर्थ
लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश — ये सब विधाता के हाथ में हैं। इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।
श्रीरामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड
कथा
हरिश्चंद्र: जब सच बोलना आसान न रहे
राजा हरिश्चंद्र की पहचान ही सत्य से जुड़ी थी।
लेकिन किसी सिद्धांत की असली परीक्षा तब नहीं होती जब उसे निभाना आसान हो।
असली परीक्षा तब होती है जब उसी सिद्धांत की कीमत बहुत बड़ी हो जाए।
कथा के अनुसार विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा ली।
हरिश्चंद्र को अपना राज्य छोड़ना पड़ा।
फिर भी उनकी परीक्षा खत्म नहीं हुई।
उन्हें दक्षिणा देनी थी।
राजा के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।
उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र तक को बेच दिया और स्वयं भी दास के रूप में काम करने लगे।
उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका था।
राजमहल से श्मशान तक।
राजा से सेवक तक।
लेकिन उन्होंने अपना वचन नहीं छोड़ा।
फिर कथा का सबसे कठिन क्षण आता है।
उनका पुत्र मर जाता है।
उनकी पत्नी अपने पुत्र का शव लेकर उसी श्मशान में पहुंचती है जहां हरिश्चंद्र काम कर रहे थे।
सोचिए, एक पिता के सामने उसका अपना पुत्र पड़ा है।
पत्नी सामने खड़ी है।
और फिर भी हरिश्चंद्र अपने कर्तव्य के कारण अंतिम संस्कार का शुल्क मांगते हैं।
यह दृश्य किसी भी इंसान को भीतर से हिला देने वाला है।
आखिरकार देवताओं और विश्वामित्र के सामने यह पूरी परीक्षा समाप्त होती है और हरिश्चंद्र को उनका परिवार और राज्य वापस मिलता है।
लेकिन इस कहानी का असली प्रश्न यह नहीं है कि अंत में उन्हें सब वापस मिला।
प्रश्न यह है —
अगर मुझे अपने सिद्धांत की कीमत चुकानी पड़े, तो मैं कितना टिकूंगा?
हम अक्सर कहते हैं — "मैं हमेशा सच बोलता हूं।
"
लेकिन जब सच बोलने से नौकरी जा सकती हो?
जब किसी रिश्ते में समस्या हो सकती हो?
जब अपना नुकसान हो सकता हो?
तब वही बात कठिन हो जाती है।
Linked wisdom: Markandeya Purana / Aitareya Brahmana traditions — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: सत्य, त्याग, कर्तव्य
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “बाहर से मेरी जिंदगी ठीक दिखती है---घर है, काम है, रिश्ते हैं और बहुत-सी ऐसी चीज़ें हैं जिनके लिए लोग मुझे भाग्यशाली कहेंगे।
फिर भी जब मैं अकेला बैठता हूँ तो अंदर एक खाली जगह महसूस होती है।
आखिर यह खालीपन किस चीज़ का है?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश — ये सब विधाता के हाथ में हैं।
इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — सिद्धांत की कीमत तभी समझ आती है जब उसे निभाना मुश्किल हो।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
सिद्धांत की कीमत तभी समझ आती है जब उसे निभाना मुश्किल हो।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “मैं मंदिर भी गया, पूजा भी की, दोस्तों से भी मिला और खुद को काम में व्यस्त रखने की कोशिश भी की। सब कहते हैं समय के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन अंदर का दुःख कम ही नहीं हो रहा। मैं आखिर क्या करूँ?”
- “जिस इंसान को मैंने खो दिया है उसकी याद बार-बार आती है। मैं जानता हूँ कि वह वापस नहीं आएगा, लोगों ने मुझे आगे बढ़ने के लिए भी कहा है, लेकिन मन है कि उसे छोड़ ही नहीं पा रहा। मैं इस दुःख को कैसे समझूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
