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यह दर्द बाहर से किसी को दिखाई नहीं देता। मैं रोज अपने काम करता हूँ, लोगों से मिलता हूँ और सामान्य दिखता हूँ, लेकिन अंदर से कितना टूटा हुआ हूँ यह सिर्फ मैं जानता हूँ। किसी को अपनी यह बात बताना भी मुश्किल लगता है। मैं शुरुआत कैसे करूँ?

श्लोक

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।14।।

mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ āgamāpāyino 'nityās tans-titikṣhasva bhārata

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.14

चौपाई / दोहा

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥

moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula

अर्थ

मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

युधिष्ठिर और यक्ष के प्रश्न: जब दुख के बीच भी दिमाग शांत रहे

वनवास का समय था।

पांडव लंबे समय से जंगल में रह रहे थे।

एक दिन उन्हें बहुत तेज़ प्यास लगी।

नकुल पानी की तलाश में गया।

उसे एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया।

जैसे ही वह पानी पीने लगा, एक आवाज़ आई

"पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।

उसके बाद पानी पीना।

"

लेकिन प्यास बहुत तेज़ थी।

नकुल ने बात नहीं मानी और पानी पी लिया।

वह वहीं गिर पड़ा।

फिर सहदेव गया।

फिर अर्जुन।

फिर भीम।

एक-एक करके चारों भाई उसी सरोवर के पास गिर गए।

जब युधिष्ठिर वहाँ पहुंचे, तो उन्होंने जो देखा, वह किसी भी भाई के लिए असहनीय था।

चारों भाई जमीन पर पड़े थे।

लेकिन युधिष्ठिर ने तुरंत पानी की ओर हाथ नहीं बढ़ाया।

वही आवाज़ फिर आई

"यदि तुमने भी मेरी बात नहीं मानी, तो तुम्हारा भी यही हाल होगा।

"

युधिष्ठिर ने कहा

"पूछो।

मैं उत्तर दूंगा।

"

और यहीं से शुरू हुआ यक्ष के प्रश्नों का वह संवाद, जिसे आज भी भारतीय परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

एक के बाद एक सवाल।

जीवन क्या है?

धर्म क्या है?

सत्य क्या है?

मनुष्य का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया

हर दिन लोग हमारे सामने मरते हैं।

हम जानते हैं कि मृत्यु निश्चित है।

फिर भी हममें से हर व्यक्ति ऐसे जीता है जैसे मृत्यु सिर्फ दूसरों के लिए है।

यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

फिर अंत में यक्ष ने पूछा

"तुम्हारे चार भाइयों में से केवल एक को जीवित किया जा सकता है।

किसे चुनोगे?

"

अगर कोई सामान्य परिस्थिति होती, तो शायद भीम या अर्जुन को चुनना स्वाभाविक लगता।

उन दोनों की शक्ति पांडवों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

लेकिन युधिष्ठिर ने नकुल को चुना।

यक्ष ने पूछा

"तुमने भीम और अर्जुन को छोड़कर नकुल को क्यों चुना?

"

युधिष्ठिर ने न्याय की बात कही।

कुंती का एक पुत्र स्वयं युधिष्ठिर जीवित था।

माद्री के दोनों पुत्र मर चुके थे।

यदि न्याय करना है, तो माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए।

यह जवाब सुनकर यक्ष प्रसन्न हुए।

और अंततः चारों भाई जीवित हो गए।

इस कहानी में मुझे सबसे ज्यादा जो बात छूती है, वह यह नहीं कि यक्ष ने प्रश्न पूछे।

वह यह है कि युधिष्ठिर ने अपने सबसे बड़े दुख के बीच निर्णय लिया।

उन्होंने अपनी सुविधा नहीं चुनी।

उन्होंने न्याय चुना।

हमारे जीवन में भी कई बार ऐसा होता है।

जब हम दुखी होते हैं, तब हम जल्दी निर्णय लेना चाहते हैं।

जब गुस्सा होता है, तब तुरंत जवाब देना चाहते हैं।

जब डर होता है, तब किसी भी रास्ते से निकलना चाहते हैं।

लेकिन कभी-कभी सबसे बुद्धिमान काम बस इतना होता है

रुकना।

सवाल सुनना।

फिर जवाब देना।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Vana Parva — Yaksha Prashna; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: सत्य, जीवन के प्रश्न, धैर्य

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “यह दर्द बाहर से किसी को दिखाई नहीं देता।

मैं रोज अपने काम करता हूँ, लोगों से मिलता हूँ और सामान्य दिखता हूँ, लेकिन अंदर से कितना टूटा हुआ हूँ यह सिर्फ मैं जानता हूँ।

किसी को अपनी यह बात बताना भी मुश्किल लगता है।

मैं शुरुआत कैसे करूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।

पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर मुश्किल परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं।

कभी-कभी एक मिनट का संयम हमें ऐसा फैसला लेने से बचा सकता है जिसे बाद में बदलना मुश्किल हो।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर मुश्किल परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं। कभी-कभी एक मिनट का संयम हमें ऐसा फैसला लेने से बचा सकता है जिसे बाद में बदलना मुश्किल हो।

कलश — शुभता का प्रतीक

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क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक