यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
यह दर्द बाहर से किसी को दिखाई नहीं देता। मैं रोज अपने काम करता हूँ, लोगों से मिलता हूँ और सामान्य दिखता हूँ, लेकिन अंदर से कितना टूटा हुआ हूँ यह सिर्फ मैं जानता हूँ। किसी को अपनी यह बात बताना भी मुश्किल लगता है। मैं शुरुआत कैसे करूँ?
श्लोक
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।14।।
mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ āgamāpāyino 'nityās tans-titikṣhasva bhārata
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.14
चौपाई / दोहा
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula
अर्थ
मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
सती: जब अपमान का दर्द भीतर सब कुछ जला दे
सती का जीवन एक ऐसे मोड़ पर पहुंचा जहां दुख सिर्फ दुख नहीं रहा था—वह अपमान, क्रोध और असहनीय पीड़ा में बदल गया था।
सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं और उन्होंने भगवान शिव से विवाह किया था।
दक्ष इस विवाह से प्रसन्न नहीं थे और शिव के प्रति उनके मन में सम्मान नहीं था।
एक बड़े यज्ञ का आयोजन हुआ।
शिव को आमंत्रित नहीं किया गया।
सती को यह बात पता चली तो वे अपने पिता के घर चली गईं।
उनके मन में शायद यह उम्मीद थी कि पिता के घर जाने पर सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन वहां उन्होंने अपने पति के प्रति अपमानजनक बातें सुनीं।
जिस व्यक्ति को वे अपना जीवनसाथी मानती थीं, उसका अपमान उनके सामने हो रहा था।
सती के लिए यह सिर्फ किसी व्यक्ति का अपमान नहीं था।
यह उनके अपने निर्णय, अपने प्रेम और अपने जीवन का अपमान जैसा था।
उनका मन उस पीड़ा को सह नहीं पाया।
कथा के अनुसार, उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना शरीर त्याग दिया।
जब यह समाचार शिव तक पहुंचा, तो उनका दुःख और क्रोध इतना गहरा था कि उससे आगे एक भयंकर विनाशकारी क्रम शुरू हुआ।
वीरभद्र का प्रकट होना और दक्ष के यज्ञ का नष्ट होना इसी प्रसंग का हिस्सा है।
लेकिन सती और शिव की कथा केवल विनाश पर समाप्त नहीं होती।
आगे चलकर सती पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेती हैं और शिव-पार्वती का पुनर्मिलन होता है।
यहीं यह कहानी एक दूसरी दिशा लेती है।
हमारे जीवन में भी कभी ऐसा होता है कि कोई बात हमें इतनी चोट पहुंचाती है कि लगता है अब कुछ पहले जैसा नहीं रहेगा।
किसी अपने का अपमान।
किसी रिश्ते का टूटना।
किसी प्रिय व्यक्ति को खो देना।
कभी-कभी हम दुखी होते हैं और हमें पता भी नहीं चलता कि वह दुख कब क्रोध बन गया।
इसलिए इस कथा को सिर्फ क्रोध की कहानी की तरह नहीं, बल्कि दुख की गहराई को समझने वाली कहानी की तरह भी पढ़ा जा सकता है।
Linked wisdom: to be verse-verified — Shiva Purana / Devi Bhagavata | Evidence: traditional | Topics: प्रियजन का खोना, क्रोध, पुनर्जन्म (नया आरंभ)
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “यह दर्द बाहर से किसी को दिखाई नहीं देता।
मैं रोज अपने काम करता हूँ, लोगों से मिलता हूँ और सामान्य दिखता हूँ, लेकिन अंदर से कितना टूटा हुआ हूँ यह सिर्फ मैं जानता हूँ।
किसी को अपनी यह बात बताना भी मुश्किल लगता है।
मैं शुरुआत कैसे करूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।
पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — दुख को दबाते रहना भी ठीक नहीं और उसे ऐसा क्रोध बना देना भी ठीक नहीं जो हमें ही जला दे।
दुख को पहचानना, उसे स्वीकार करना और उसके साथ सही तरीके से जीना भी एक साधना है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
दुख को दबाते रहना भी ठीक नहीं और उसे ऐसा क्रोध बना देना भी ठीक नहीं जो हमें ही जला दे। दुख को पहचानना, उसे स्वीकार करना और उसके साथ सही तरीके से जीना भी एक साधना है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “मैं मंदिर भी गया, पूजा भी की, दोस्तों से भी मिला और खुद को काम में व्यस्त रखने की कोशिश भी की। सब कहते हैं समय के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन अंदर का दुःख कम ही नहीं हो रहा। मैं आखिर क्या करूँ?”
- “जिस इंसान को मैंने खो दिया है उसकी याद बार-बार आती है। मैं जानता हूँ कि वह वापस नहीं आएगा, लोगों ने मुझे आगे बढ़ने के लिए भी कहा है, लेकिन मन है कि उसे छोड़ ही नहीं पा रहा। मैं इस दुःख को कैसे समझूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
