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हालात लगातार खराब हो रहे हैं। पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है। फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है। क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?
श्लोक
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5
चौपाई / दोहा
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥
jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu
अर्थ
जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
सावित्री: जब सामने मृत्यु हो और फिर भी बातचीत बाकी हो
सावित्री को पहले ही बता दिया गया था कि सत्यवान की आयु बहुत छोटी है।
नारद मुनि ने चेतावनी दी थी कि विवाह के बाद सत्यवान केवल एक वर्ष जीवित रहेगा।
किसी भी व्यक्ति के लिए यह सुनना आसान नहीं।
सावित्री के सामने विकल्प था।
वह चाहती तो पीछे हट सकती थी।
लेकिन उसने सत्यवान को चुना।
उसने सोचा — जिंदगी कितनी लंबी होगी, यह मेरे हाथ में नहीं।
लेकिन जिसके साथ जीवन बिताना है, उसका चुनाव मैं कर चुकी हूं।
एक वर्ष बीत गया।
सावित्री को पता था कि वह दिन आने वाला है।
जिस दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, सावित्री भी उनके साथ गईं।
कुछ देर बाद सत्यवान ने कहा कि उनके सिर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है।
वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए।
और फिर उनकी मृत्यु हो गई।
सावित्री ने देखा कि यमराज उनकी आत्मा लेकर जा रहे हैं।
यह वह क्षण था जहां कोई भी टूट सकता था।
लेकिन सावित्री उनके पीछे चल पड़ीं।
यमराज ने कहा —
"तुम लौट जाओ।
"
लेकिन सावित्री लौटने को तैयार नहीं थीं।
वह उनके साथ चलती रहीं।
यमराज ने उनकी दृढ़ता देखी और कहा कि पति के प्राणों के अलावा कोई वर मांग सकती हैं।
सावित्री ने एक वर मांगा।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
हर बार उन्होंने ऐसा वर चुना जिसमें उनके परिवार का भविष्य जुड़ा था।
अंत में उन्होंने कहा —
"मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों का वर दीजिए।
"
यमराज रुक गए।
क्योंकि यदि सत्यवान जीवित नहीं होंगे, तो यह वर कैसे पूरा होगा?
कहानी के अनुसार, यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े।
लेकिन सावित्री की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं थी कि उन्होंने मृत्यु को रोक दिया।
उनकी ताकत इस बात में थी कि जब सबसे बड़ा दुख सामने आया, तब भी उन्होंने अपना विवेक नहीं खोया।
उन्होंने चिल्लाकर नहीं, सोचकर बात की।
उन्होंने लड़ाई नहीं की।
उन्होंने रास्ता बनाया।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Vana Parva — Savitri Upakhyana; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: प्रियजन का जाना, प्रियजन की बीमारी, मृत्यु का भय
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “हालात लगातार खराब हो रहे हैं।
पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है।
फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है।
क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं।
सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर संकट को ताकत से नहीं जीता जाता।
कुछ परिस्थितियों में धैर्य, बातचीत और बुद्धि ज्यादा काम करती है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर संकट को ताकत से नहीं जीता जाता। कुछ परिस्थितियों में धैर्य, बातचीत और बुद्धि ज्यादा काम करती है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “मैं कई बार उम्मीद लगाकर टूट चुका हूँ। हर बार सोचता हूँ कि इस बार शायद सब ठीक होगा, फिर कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि निराश होना पड़ता है। फिर भी कुछ दिनों बाद मैं दोबारा उम्मीद करने लगता हूँ। क्या यह मेरी कमजोरी है या मेरे अंदर की कोई ताकत?”
- “अभी मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा जिससे उम्मीद बंधे। लोग कहते हैं सकारात्मक सोचो, लेकिन सिर्फ यह कह देने से मन में उम्मीद पैदा नहीं होती। जब सामने कोई रास्ता ही दिखाई न दे तो उम्मीद आखिर आती कहाँ से है?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
