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मुझे पता है कि मुझे एक कठिन फैसला लेना है और शायद उसे टालते रहने से बात और बिगड़ेगी। फिर भी जब फैसला लेने का समय आता है तो डर जाता हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि सही काम करने के लिए अपने अंदर वह हिम्मत कहाँ से लाऊँ।
श्लोक
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।
dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati
श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28
चौपाई / दोहा
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
kadara mana kahun eka adhara, daiva daiva alasi pukara
अर्थ
कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना। साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
सावित्री: जब सामने मृत्यु हो और फिर भी बातचीत बाकी हो
सावित्री को पहले ही बता दिया गया था कि सत्यवान की आयु बहुत छोटी है।
नारद मुनि ने चेतावनी दी थी कि विवाह के बाद सत्यवान केवल एक वर्ष जीवित रहेगा।
किसी भी व्यक्ति के लिए यह सुनना आसान नहीं।
सावित्री के सामने विकल्प था।
वह चाहती तो पीछे हट सकती थी।
लेकिन उसने सत्यवान को चुना।
उसने सोचा — जिंदगी कितनी लंबी होगी, यह मेरे हाथ में नहीं।
लेकिन जिसके साथ जीवन बिताना है, उसका चुनाव मैं कर चुकी हूं।
एक वर्ष बीत गया।
सावित्री को पता था कि वह दिन आने वाला है।
जिस दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, सावित्री भी उनके साथ गईं।
कुछ देर बाद सत्यवान ने कहा कि उनके सिर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है।
वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए।
और फिर उनकी मृत्यु हो गई।
सावित्री ने देखा कि यमराज उनकी आत्मा लेकर जा रहे हैं।
यह वह क्षण था जहां कोई भी टूट सकता था।
लेकिन सावित्री उनके पीछे चल पड़ीं।
यमराज ने कहा —
"तुम लौट जाओ।
"
लेकिन सावित्री लौटने को तैयार नहीं थीं।
वह उनके साथ चलती रहीं।
यमराज ने उनकी दृढ़ता देखी और कहा कि पति के प्राणों के अलावा कोई वर मांग सकती हैं।
सावित्री ने एक वर मांगा।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
हर बार उन्होंने ऐसा वर चुना जिसमें उनके परिवार का भविष्य जुड़ा था।
अंत में उन्होंने कहा —
"मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों का वर दीजिए।
"
यमराज रुक गए।
क्योंकि यदि सत्यवान जीवित नहीं होंगे, तो यह वर कैसे पूरा होगा?
कहानी के अनुसार, यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े।
लेकिन सावित्री की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं थी कि उन्होंने मृत्यु को रोक दिया।
उनकी ताकत इस बात में थी कि जब सबसे बड़ा दुख सामने आया, तब भी उन्होंने अपना विवेक नहीं खोया।
उन्होंने चिल्लाकर नहीं, सोचकर बात की।
उन्होंने लड़ाई नहीं की।
उन्होंने रास्ता बनाया।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Vana Parva — Savitri Upakhyana; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: प्रियजन का जाना, प्रियजन की बीमारी, मृत्यु का भय
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मुझे पता है कि मुझे एक कठिन फैसला लेना है और शायद उसे टालते रहने से बात और बिगड़ेगी।
फिर भी जब फैसला लेने का समय आता है तो डर जाता हूँ।
मुझे समझ नहीं आता कि सही काम करने के लिए अपने अंदर वह हिम्मत कहाँ से लाऊँ।
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना।
साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर संकट को ताकत से नहीं जीता जाता।
कुछ परिस्थितियों में धैर्य, बातचीत और बुद्धि ज्यादा काम करती है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर संकट को ताकत से नहीं जीता जाता। कुछ परिस्थितियों में धैर्य, बातचीत और बुद्धि ज्यादा काम करती है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “लोग मुझे देखकर कहते हैं कि मैं बहुत मजबूत हूँ और मुश्किल समय में भी संभाल लेता हूँ। लेकिन सच यह है कि अंदर से मैं हर दिन किसी न किसी डर से लड़ता हूँ। अगर डर मेरे अंदर है ही, तो क्या मैं फिर भी साहसी कहलाऊँगा?”
- “मुझे पता है कि किसी बात पर सच बोलना चाहिए, लेकिन डर लगता है कि सच बोलने के बाद नौकरी, रिश्ता या लोगों का भरोसा कहीं न चला जाए। सही बात जानते हुए भी चुप रह जाना आसान लगता है। ऐसे समय में साहस कैसे दिखाऊँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
