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कई बार लोग कहते हैं कि बस धैर्य रखो और सब सहते रहो। लेकिन अगर सामने कोई गलत स्थिति है तो क्या सिर्फ सहते रहना ही धैर्य है? क्या धैर्य रखने का मतलब यह भी हो सकता है कि मैं शांत रहकर सही दिशा में लगातार कुछ करता रहूँ?

श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47

चौपाई / दोहा

धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥

dheeraja dharama mitra aru nari, apada kala parikhiahin chari

अर्थ

धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसंगिनी — इन चारों की परख कठिन समय में ही होती है। संकट परीक्षा है, दंड नहीं।

श्रीरामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड

कथा

अंबरीष: जब जवाब देने के बजाय ठहरना बेहतर हो

राजा अंबरीष एक व्रत का पालन कर रहे थे।

व्रत पूरा होने वाला था और उसी समय ऋषि दुर्वासा अतिथि बनकर आए।

अंबरीष ने उनका सम्मान किया और भोजन के लिए उनका इंतजार करने लगे।

दुर्वासा स्नान के लिए चले गए।

इधर व्रत पूरा करने का समय निकल रहा था।

अंबरीष एक कठिन स्थिति में पड़ गए।

अगर व्रत का समय निकल गया तो नियम टूट सकता था।

और अगर अतिथि के बिना भोजन कर लिया तो अतिथि का अपमान माना जा सकता था।

उन्होंने ऐसा रास्ता चुना जिसमें उन्होंने केवल जल ग्रहण किया और दुर्वासा की प्रतीक्षा करते रहे।

जब दुर्वासा लौटे और उन्हें यह पता चला, तो वे बहुत क्रोधित हो गए।

उन्होंने इसे अपना अपमान माना और क्रोध में अंबरीष को दंड देने के लिए एक भयंकर शक्ति उत्पन्न की।

लेकिन अंबरीष भागे नहीं।

उन्होंने बदला लेने की कोशिश नहीं की।

उन्होंने उसी क्रोध से जवाब नहीं दिया।

कथा के अनुसार भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ और उस शक्ति को नष्ट कर दिया।

इसके बाद दुर्वासा स्वयं भयभीत होकर बचने के लिए जगह-जगह गए।

अंततः उन्हें अंबरीष के पास ही लौटना पड़ा।

जिस व्यक्ति से वे नाराज थे, उसी के सामने उन्हें क्षमा मांगनी पड़ी।

अंबरीष ने उन्हें अपमानित नहीं किया।

उन्होंने उनके लिए प्रार्थना की।

यहां कहानी बहुत सीधी हो जाती है।

जब कोई हम पर गुस्सा करता है, हमारा पहला स्वभाव होता है "अब मैं भी दिखाता हूं।

"

कोई हमें ऊंची आवाज में बोलता है।

हम उससे ज्यादा ऊंची आवाज में बोलते हैं।

कोई अपमान करता है।

हम उससे बड़ा जवाब देने लगते हैं।

और कुछ मिनटों का गुस्सा घंटों, दिनों या सालों का रिश्ता खराब कर देता है।

हर बार चुप रहना सही नहीं होता।

लेकिन हर बार तुरंत प्रतिक्रिया देना भी जरूरी नहीं।

Linked wisdom: Srimad Bhagavatam, 9th Canto — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: धैर्य, भक्ति, क्रोध

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “कई बार लोग कहते हैं कि बस धैर्य रखो और सब सहते रहो।

लेकिन अगर सामने कोई गलत स्थिति है तो क्या सिर्फ सहते रहना ही धैर्य है?

क्या धैर्य रखने का मतलब यह भी हो सकता है कि मैं शांत रहकर सही दिशा में लगातार कुछ करता रहूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसंगिनी इन चारों की परख कठिन समय में ही होती है।

संकट परीक्षा है, दंड नहीं।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है कभी-कभी प्रतिक्रिया रोक लेना कमजोरी नहीं, अपने ऊपर नियंत्रण है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

कभी-कभी प्रतिक्रिया रोक लेना कमजोरी नहीं, अपने ऊपर नियंत्रण है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक