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जिन लोगों पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया, आखिर में चोट भी उन्हीं से मिली। अब कोई अच्छा इंसान सामने आता है तो भी मन तुरंत कहता है कि ज्यादा भरोसा मत करना, फिर चोट लगेगी। क्या भरोसा टूट जाने के बाद दोबारा किसी पर भरोसा करना संभव है?

श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47

चौपाई / दोहा

जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥

jaki rahi bhavana jaisi, prabhu murati dekhi tina taisi

अर्थ

जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है। बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

मीरा: जब अपनी सच्चाई दूसरों की उम्मीदों से बड़ी हो जाए

मीरा राजपरिवार में थीं।

उनके पास वह सब था जिसे बाहर से देखकर लोग सुख मानते हैं महल, प्रतिष्ठा, सुरक्षा।

लेकिन उनके भीतर कृष्ण के प्रति एक गहरा प्रेम था।

बचपन से ही उनका मन कृष्ण भक्ति में लगा हुआ था।

जैसे-जैसे वह बड़ी हुईं, उनका यह विश्वास उनके आसपास की सामाजिक अपेक्षाओं से टकराने लगा।

राजपरिवार की मर्यादाएं थीं।

क्या पहनना है।

कहां जाना है।

किसके सामने बैठना है।

किससे मिलना है।

कैसे रहना है।

लेकिन मीरा का मन मंदिरों और भक्ति में था।

उन्हें रोकने की कोशिशें हुईं।

उनके बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं विष का प्याला, सांप वाली टोकरी और दूसरी परीक्षाएं।

इन कथाओं को परंपरा ने उनकी भक्ति की दृढ़ता के प्रतीक के रूप में याद रखा है।

मीरा का रास्ता आसान नहीं था।

उन्होंने राजसी जीवन की सुरक्षा के बजाय अपने विश्वास को चुना।

उन्होंने भजन गाए।

संतों के साथ बैठीं।

मंदिरों में गईं।

और धीरे-धीरे वह जीवन पीछे छोड़ दिया जिसे समाज उनके लिए "उचित" मानता था।

आज भी मीरा के पद गाए जाते हैं।

क्यों?

क्योंकि उनकी कहानी केवल एक राजघराने की स्त्री की कहानी नहीं रह गई।

वह उस व्यक्ति की कहानी बन गई जो कहता है

"मेरे भीतर जो सत्य है, उसे मैं सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ूंगा क्योंकि लोग उसे पसंद नहीं करते।

"

लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है।

अपनी सच्चाई के नाम पर हर जिद सही नहीं होती।

मीरा की कहानी का अर्थ यह नहीं कि हर सामाजिक नियम तोड़ देना चाहिए।

सवाल यह है

जो मैं मान रहा हूं, क्या वह वास्तव में मेरा गहरा विश्वास है?

या सिर्फ मेरा अहंकार?

Linked wisdom: Mirabai's devotional tradition and attributed bhajans; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: श्रद्धा, परिवार का दबाव, स्वतंत्रता

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जिन लोगों पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया, आखिर में चोट भी उन्हीं से मिली।

अब कोई अच्छा इंसान सामने आता है तो भी मन तुरंत कहता है कि ज्यादा भरोसा मत करना, फिर चोट लगेगी।

क्या भरोसा टूट जाने के बाद दोबारा किसी पर भरोसा करना संभव है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है।

बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है दूसरों की अपेक्षाओं में जीते-जीते कभी-कभी हम अपनी आवाज़ सुनना बंद कर देते हैं।

लेकिन अपनी आवाज़ सुनना और हर बात में अपनी जिद करना एक ही चीज़ नहीं है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

दूसरों की अपेक्षाओं में जीते-जीते कभी-कभी हम अपनी आवाज़ सुनना बंद कर देते हैं। लेकिन अपनी आवाज़ सुनना और हर बात में अपनी जिद करना एक ही चीज़ नहीं है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक