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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

हम अलग तो हो गए हैं, लेकिन मन अभी भी पुरानी बातों और यादों में अटका है। आगे कैसे बढ़ूँ?

श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47

चौपाई / दोहा

लाभु हानि जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥

labhu hani jivanu maranu jasu apajasu bidhi hatha

अर्थ

लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश — ये सब विधाता के हाथ में हैं। इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।

श्रीरामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड

कथा

राम और परशुराम: जब ताकत को खुद को साबित करने की जरूरत न हो

सीता स्वयंवर के बाद का समय था।

शिव धनुष टूट चुका था और सभा में अभी उस घटना की चर्चा चल ही रही थी।

तभी परशुराम वहां पहुंचे।

वे क्रोध में थे।

उनके सामने शिव का धनुष टूट चुका था और वे जानना चाहते थे कि ऐसा करने का साहस किसने किया।

सभा में तनाव फैल गया।

राम आगे आए और बहुत शांत स्वर में स्वीकार किया कि धनुष उन्होंने ही उठाया था।

परशुराम का क्रोध और बढ़ गया।

उन्होंने राम को चुनौती दी।

उनके सामने विष्णु का धनुष रखा और कहा कि अगर राम वास्तव में इतने सामर्थ्यवान हैं, तो उसे उठाकर दिखाएं।

यह वह क्षण था जहां कोई भी युवा योद्धा अपने अहंकार में सकता था।

राम के पास अपनी शक्ति दिखाने का पूरा अवसर था।

लेकिन राम ने परशुराम का अपमान नहीं किया।

उन्होंने बहस नहीं की।

उन्होंने अपनी महानता बताने की कोशिश नहीं की।

वे शांत रहे और धनुष उठा लिया।

जब परशुराम ने राम की वास्तविकता को पहचाना, तो उनका क्रोध धीरे-धीरे शांत हो गया।

मुझे इस प्रसंग में राम की शक्ति से ज्यादा उनकी शांति महत्वपूर्ण लगती है।

हमारे जीवन में भी ऐसे लोग आते हैं जो हमें बार-बार साबित करने के लिए मजबूर करते हैं कि हम क्या कर सकते हैं।

ऑफिस में कोई हमारी क्षमता पर सवाल करता है।

परिवार में कोई हमें कम समझता है।

किसी प्रतियोगिता में कोई हमें चुनौती देता है।

और हमारा मन तुरंत कहता है "अच्छा, अब मैं दिखाता हूं कि मैं क्या कर सकता हूं।

"

लेकिन हर चुनौती का जवाब गुस्से से देना जरूरी नहीं।

कभी-कभी सबसे मजबूत जवाब यह होता है कि आप अपना काम करें और परिणाम को बोलने दें।

Linked wisdom: Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Bala Kanda — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: अहंकार, आत्मसंशय

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “हम अलग तो हो गए हैं, लेकिन मन अभी भी पुरानी बातों और यादों में अटका है।

आगे कैसे बढ़ूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश ये सब विधाता के हाथ में हैं।

इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है जिसे अपनी शक्ति पर भरोसा होता है, उसे हर समय अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ती।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

जिसे अपनी शक्ति पर भरोसा होता है, उसे हर समय अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ती।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक