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जिस पर मैंने आंख बंद करके भरोसा किया था, उसी ने मुझे धोखा दिया। अब मुझे समझ नहीं आता किसी पर भरोसा कैसे करूँ।

श्लोक

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः।।36।।

nihatya dhārtarāṣhṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana pāpam evāśhrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.36

चौपाई / दोहा

धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥

dheeraja dharama mitra aru nari, apada kala parikhiahin chari

अर्थ

धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसंगिनी — इन चारों की परख कठिन समय में ही होती है। संकट परीक्षा है, दंड नहीं।

श्रीरामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड

कथा

दमयंती: जब अपना ही व्यक्ति आपको अकेला छोड़ जाए

दमयंती और नल एक-दूसरे से प्रेम करते थे।

उनका विवाह हुआ।

लेकिन बाद में नल जुए में अपना राज्य और सब कुछ खो बैठे।

हार के बाद उनकी हालत बदलती गई।

शर्म, निराशा और अपराधबोध उन्हें भीतर से खाता रहा।

फिर एक रात उन्होंने ऐसा फैसला किया जिसने दमयंती की जिंदगी बदल दी।

जब वह सो रही थीं, नल उन्हें जंगल में अकेला छोड़कर चले गए।

सुबह दमयंती उठीं तो नल वहां नहीं थे।

सोचिए उस पल के बारे में।

जिस इंसान के साथ आपने अपना पूरा जीवन जोड़ दिया हो, वही अचानक आपके साथ हो।

कोई घर।

कोई सुरक्षा।

कोई पता कि वह कहां गए।

यह पता कि वह वापस आएंगे या नहीं।

दमयंती टूट सकती थीं।

लेकिन उन्होंने खुद को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया।

उन्होंने रास्ता खोजा।

लोगों से सहायता ली।

एक सुरक्षित स्थान तक पहुंचीं।

और अपने जीवन को किसी तरह आगे बढ़ाया।

वह नल को खोजती रहीं।

समय बीता।

आखिरकार उनकी बुद्धि और दृढ़ता से नल का पता चला और दोनों फिर मिले।

इस कहानी में मुझे एक बात बहुत मानवीय लगती है।

कभी-कभी कोई व्यक्ति हमें छोड़कर जाता है क्योंकि वह हमसे प्यार नहीं करता और कभी-कभी वह अपनी ही कमजोरी, शर्म या डर में ऐसा करता है।

लेकिन कारण कुछ भी हो, पीछे छूटे व्यक्ति का दर्द तो वास्तविक रहता है।

अगर आपके साथ ऐसा हुआ है, तो मन बार-बार पूछता है

"मैं ही क्यों?

"

"मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?

"

"क्या मुझमें कोई कमी थी?

"

हर बार जवाब "हां" नहीं होता।

कभी-कभी दूसरे व्यक्ति का निर्णय उनकी अपनी लड़ाई होती है।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Vana Parva — Nala-Damayanti episode, citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: अकेलापन, विश्वासघात, साहस

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जिस पर मैंने आंख बंद करके भरोसा किया था, उसी ने मुझे धोखा दिया।

अब मुझे समझ नहीं आता किसी पर भरोसा कैसे करूँ।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसंगिनी इन चारों की परख कठिन समय में ही होती है।

संकट परीक्षा है, दंड नहीं।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है किसी के चले जाने से मेरी पूरी कीमत खत्म नहीं हो जाती।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

किसी के चले जाने से मेरी पूरी कीमत खत्म नहीं हो जाती।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक