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मैं किसी के इतने करीब हो गया हूँ कि उसके बिना खुद को अधूरा महसूस करता हूँ। क्या इतना गहरा लगाव सही है?

श्लोक

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः।।36।।

nihatya dhārtarāṣhṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana pāpam evāśhrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.36

चौपाई / दोहा

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥

Sunu muni tohi kahaun saharosa, bhajahin je mohi taji sakal bharosa

अर्थ

जो सब आसरे छोड़कर मुझ पर भरोसा करते हैं, उनका भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।

श्रीरामचरितमानस · अरण्यकाण्ड

कथा

नचिकेता और यम: जब मन ने आसान रास्ता मानने से इनकार कर दिया

नचिकेता बहुत छोटा था।

लेकिन उसके भीतर एक ऐसी बात थी जो शायद उम्र से नहीं आती वह जो देखता था, उसके बारे में सवाल करता था।

एक दिन उसके पिता, ऋषि वाजश्रवा, एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे और अपनी संपत्ति दान कर रहे थे।

लोग देख रहे थे कि कितना बड़ा दान हो रहा है।

लेकिन नचिकेता की नजर उन गायों पर पड़ी जिन्हें दान में दिया जा रहा था।

वे बूढ़ी थीं, दूध नहीं देती थीं, चलने में भी कमजोर थीं।

नचिकेता के मन में सवाल आया अगर दान करना है, तो ऐसी चीज़ क्यों दी जा रही है जिसका कोई उपयोग ही नहीं बचा?

वह छोटा था, इसलिए शायद उसे यह अंदाजा नहीं था कि बड़े लोगों के सामने ऐसे सवाल पूछने का क्या असर होता है।

उसने पिता से पूछा,

"पिताजी, आप मुझे किसे दान करेंगे?

"

पिता ने पहले कोई जवाब नहीं दिया।

नचिकेता ने फिर पूछा।

फिर पूछा।

बार-बार पूछने पर पिता नाराज़ हो गए और गुस्से में कह बैठे

"मैं तुझे मृत्यु को देता हूँ।

"

शब्द निकल गए।

बाद में शायद पिता को भी लगा होगा कि उन्होंने गुस्से में कुछ ऐसा कह दिया जिसे कहना नहीं चाहिए था।

लेकिन नचिकेता ने उस बात को मजाक की तरह नहीं लिया।

उसने सोचा अगर पिता ने कहा है कि मुझे मृत्यु को देते हैं, तो मुझे जाना चाहिए।

और वह सच में यमराज के पास चला गया।

जब वह यमराज के द्वार पहुँचा, यमराज वहाँ नहीं थे।

नचिकेता इंतजार करता रहा।

एक दिन।

दो दिन।

तीन दिन।

बिना भोजन के, बिना पानी के।

जब यमराज लौटे, तो उन्हें पता चला कि एक बालक तीन दिनों से उनके द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है।

उन्होंने नचिकेता से क्षमा मांगी और तीन वरदान देने का वचन दिया।

पहला वरदान नचिकेता ने अपने पिता के लिए मांगा जब वह वापस जाए, तो पिता का क्रोध शांत हो चुका हो और वे उसे प्रेम से स्वीकार करें।

दूसरे वरदान में उसने यज्ञ का ज्ञान मांगा।

फिर तीसरा वरदान आया।

यहीं से नचिकेता की कहानी साधारण नहीं रहती।

उसने पूछा

"मृत्यु के बाद क्या होता है?

मनुष्य के मर जाने के बाद क्या बचता है?

आत्मा रहती है या सब कुछ समाप्त हो जाता है?

"

यमराज कुछ देर शांत रहे।

उन्होंने कहा यह प्रश्न बहुत कठिन है।

इसे छोड़ दो।

इसके बदले मैं तुम्हें धन दे सकता हूं, लंबी उम्र दे सकता हूं, राज्य दे सकता हूं, सुख दे सकता हूं।

जो चाहो मांग लो।

सोचिए सामने मृत्यु के देवता हैं और वे खुद कह रहे हैं कि जीवन के सारे सुख ले लो, बस यह सवाल मत पूछो।

लेकिन नचिकेता नहीं माना।

उसने लगभग यही बात समझाई कि धन कितना भी हो, आखिर एक दिन समाप्त हो जाएगा।

लंबी उम्र भी अंत में मृत्यु तक ही जाएगी।

इंद्रियों के सुख हमेशा नहीं रहेंगे।

उसे कुछ और चाहिए था।

उसे जवाब चाहिए था।

यमराज ने तब उसे वह बात समझाई जो कठोपनिषद की सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं में से एक बन गई

"श्रेय" और "प्रेय" मनुष्य के सामने हमेशा साथ आते हैं।

एक रास्ता वह है जो अभी अच्छा लगता है आसान, सुखद, आकर्षक।

दूसरा वह है जो शायद कठिन हो, लेकिन भीतर से सही और श्रेष्ठ हो।

बुद्धिमान व्यक्ति दोनों को पहचानकर श्रेय चुनता है।

और मुझे लगता है, नचिकेता की पूरी कहानी इसी एक चुनाव के बारे में है।

हमारी जिंदगी में भी ऐसे मौके आते हैं।

कहीं नौकरी का फैसला होता है।

कहीं पैसे का।

कहीं रिश्ते का।

कहीं कोई ऐसी बात होती है जिसमें हम जानते हैं कि आसान रास्ता क्या है और सही रास्ता क्या है।

आसान रास्ता तुरंत राहत देता है।

सही रास्ता शायद कुछ समय तक परेशान करता है।

नचिकेता ने आसान रास्ता नहीं चुना।

उसने कहा मुझे वही जानना है जिसके लिए मैं आया हूं।

यमराज ने तब उसे आत्मा का ज्ञान दिया वह सत्य जो शरीर के नष्ट होने के साथ नष्ट नहीं होता।

उपनिषद् · Linked wisdom: Katha Upanishad 1.2.1–1.2.2 | Evidence: scriptural for the cited teaching; narrative frame traditional | Topics: मृत्यु का भय, जीवन के प्रश्न, सुख क्या है

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मैं किसी के इतने करीब हो गया हूँ कि उसके बिना खुद को अधूरा महसूस करता हूँ।

क्या इतना गहरा लगाव सही है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो सब आसरे छोड़कर मुझ पर भरोसा करते हैं, उनका भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर अच्छी चीज़ जो तुरंत सुख दे, जरूरी नहीं कि वही मेरे लिए सही हो।

और हर कठिन चीज़ गलत नहीं होती।

कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा निर्णय यही होता है कि मैं प्रिय को चुन रहा हूं या श्रेष्ठ को।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर अच्छी चीज़ जो तुरंत सुख दे, जरूरी नहीं कि वही मेरे लिए सही हो। और हर कठिन चीज़ गलत नहीं होती। कभी-कभी जीवन का सबसे बड़ा निर्णय यही होता है कि मैं प्रिय को चुन रहा हूं या श्रेष्ठ को।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक