← वापस

यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

हर किसी की उम्मीदें पूरी करते-करते मैं थक चुका हूँ। रिश्ते निभाना अब खुशी की जगह एक बोझ जैसा लगने लगा है।

श्लोक

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।

dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28

चौपाई / दोहा

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ावै साखा॥

hoihi soi jo Rama rachi rakha, ko kari tarka badhavai sakha

अर्थ

जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा — व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है। मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

अनुसूया: जब अपनी मर्यादा बचाते हुए भी रास्ता निकले

अनुसूया का नाम भारतीय परंपरा में ऐसी स्त्री के रूप में लिया जाता है, जिसके लिए तपस्या सिर्फ साधना नहीं थी—वह उनके जीवन का आधार थी।

वे अत्रि ऋषि की पत्नी थीं और अपने संयम, सेवा और पातिव्रत्य के लिए प्रसिद्ध थीं।

कहानी में एक दिन तीन अतिथि उनके आश्रम में आए।

वे साधु के वेश में थे।

उस समय अत्रि ऋषि आश्रम में नहीं थे।

अनुसूया ने उनका स्वागत किया।

अतिथि आए हैं तो उनका सत्कार करना उनका धर्म था।

लेकिन उन साधुओं ने भोजन स्वीकार करने से पहले ऐसी शर्त रख दी, जिसने अनुसूया को एक कठिन परिस्थिति में डाल दिया।

उन्होंने कहा कि वे तभी भोजन करेंगे जब अनुसूया बिना वस्त्र के उन्हें भोजन परोसेंगी।

एक तरफ अतिथि-सत्कार की मर्यादा थी।

दूसरी तरफ अपनी गरिमा और पवित्रता की रक्षा।

ऐसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति घबरा सकता है।

लगता है जैसे सामने सिर्फ दो रास्ते हैं—या तो अपनी मर्यादा छोड़ो, या अतिथि-सत्कार का धर्म छोड़ो।

लेकिन अनुसूया ने जल्दबाजी नहीं की।

उन्होंने परिस्थिति को समझा।

अपने भीतर की शक्ति और तपस्या पर भरोसा किया।

उन्हें समझ गया कि सामने साधारण अतिथि नहीं हैं।

परंपरा के अनुसार, उन्होंने अपनी तपस्या की शक्ति से उन तीनों को छोटे-छोटे शिशुओं में परिवर्तित कर दिया।

अब परिस्थिति ही बदल गई।

जो तीन अतिथि उनके सामने परीक्षा लेने आए थे, वे छोटे बच्चों के रूप में उनके सामने थे।

अनुसूया ने उन्हें मां की तरह अपनाया और उनका पालन किया।

इस तरह अतिथि-सत्कार भी हुआ और उनकी अपनी मर्यादा भी बनी रही।

बाद में जब तीनों अपने वास्तविक स्वरूप में लौटे, तो वे अनुसूया की बुद्धि, तपस्या और अडिगता से प्रभावित हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया।

इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात मुझे यह लगती है कि अनुसूया ने कठिन परिस्थिति से निकलने के लिए अपनी मर्यादा का सौदा नहीं किया।

उन्होंने यह नहीं माना कि "अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है।

"

उन्होंने रास्ता खोजा।

और शायद जीवन में कई बार हमारी मुश्किल भी यही होती है।

हम किसी समस्या को देखते ही सोच लेते हैं कि हमारे पास केवल दो विकल्प हैं।

या तो यह करूं, या वह छोड़ दूं।

जबकि कभी-कभी तीसरा रास्ता वहीं होता है, बस हम उसे देखने की स्थिति में नहीं होते।

Linked wisdom: to be verse-verified — Puranic tradition (Markandeya Purana, Devi Bhagavata) | Evidence: traditional | Topics: समाज और धर्म, आत्मविश्वास

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “हर किसी की उम्मीदें पूरी करते-करते मैं थक चुका हूँ।

रिश्ते निभाना अब खुशी की जगह एक बोझ जैसा लगने लगा है।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है।

मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर कठिन परिस्थिति में तुरंत फैसला लेना जरूरी नहीं है।

कभी-कभी थोड़ी देर रुकना, परिस्थिति को समझना और अपने मूल्यों को सामने रखकर सोचना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी होती है।

अपनी गरिमा बचाते हुए भी रास्ता निकाला जा सकता है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर कठिन परिस्थिति में तुरंत फैसला लेना जरूरी नहीं है। कभी-कभी थोड़ी देर रुकना, परिस्थिति को समझना और अपने मूल्यों को सामने रखकर सोचना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी होती है। अपनी गरिमा बचाते हुए भी रास्ता निकाला जा सकता है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक