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मैंने अपनों से जो उम्मीदें रखीं, वो पूरी नहीं हुईं और अब बार-बार निराशा होती है। क्या मुझे उम्मीद रखना ही बंद कर देना चाहिए?

श्लोक

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः।।36।।

nihatya dhārtarāṣhṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana pāpam evāśhrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.36

चौपाई / दोहा

धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥

dheeraja dharama mitra aru nari, apada kala parikhiahin chari

अर्थ

धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसंगिनी — इन चारों की परख कठिन समय में ही होती है। संकट परीक्षा है, दंड नहीं।

श्रीरामचरितमानस · सुन्दरकाण्ड

कथा

परीक्षित: जब समय सीमित हो, तो उसे कैसे जिएं

राजा परीक्षित को जब यह पता चला कि उनके जीवन के केवल सात दिन बचे हैं, तो उनके सामने वही सवाल खड़ा हुआ जिससे शायद हम सभी किसी किसी रूप में डरते हैं—

"अगर समय सच में सीमित है, तो मैं अब क्या करूं?

"

कथा के अनुसार, ऋषि-पुत्र के श्राप के कारण सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु निश्चित हुई थी।

पहले स्वाभाविक रूप से उन्होंने बचने की कोशिश की।

सुरक्षा बढ़ाई गई।

महल की व्यवस्था बदली गई।

चारों तरफ पहरा रखा गया।

हर संभव सावधानी बरती गई।

आखिर कौन अपनी मृत्यु का इंतजार करना चाहता है?

लेकिन धीरे-धीरे परीक्षित के सामने एक सच्चाई साफ होती गई—कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें केवल सुरक्षा से नहीं टाला जा सकता।

तब उन्होंने अपने बचे हुए समय को देखने का तरीका बदल दिया।

उन्होंने सात दिन डरकर बैठने के बजाय यह तय किया कि अब वे उन सवालों के उत्तर खोजेंगे जिनका सामना इंसान अक्सर पूरी जिंदगी टालता रहता है।

जीवन क्या है?

मृत्यु क्या है?

मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?

जिस समय को वे पहले मृत्यु की उलटी गिनती समझ रहे थे, वही समय उनके लिए ज्ञान की खोज बन गया।

शुकदेव मुनि उनके पास आए और उनके प्रश्नों के उत्तर देने लगे।

यही संवाद आगे चलकर श्रीमद्भागवत की परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

सोचिए—मृत्यु की तारीख सामने थी, लेकिन परीक्षित ने आखिरी सात दिनों को सिर्फ मृत्यु के बारे में सोचकर नहीं बिताया।

उन्होंने जीवन को समझने में लगाया।

मुझे इस कहानी में यही बात सबसे ज्यादा छूती है।

हममें से बहुत लोग भी अपने जीवन को "बाद में" के लिए टालते रहते हैं।

बाद में समय मिलेगा।

बाद में परिवार के साथ बैठूंगा।

बाद में अपने मन की सुनूंगा।

बाद में वह किताब पढ़ूंगा।

बाद में ईश्वर को समझूंगा।

परीक्षित की कहानी अचानक पूछती है—

अगर वह "बाद में" हमारे पास हो ही नहीं, तो आज हम क्या करेंगे?

Linked wisdom: to be verse-verified — Srimad Bhagavatam, First Canto | Evidence: traditional | Topics: मृत्यु का भय, जीवन के प्रश्न

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मैंने अपनों से जो उम्मीदें रखीं, वो पूरी नहीं हुईं और अब बार-बार निराशा होती है।

क्या मुझे उम्मीद रखना ही बंद कर देना चाहिए?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है धैर्य, धर्म, मित्र और जीवनसंगिनी इन चारों की परख कठिन समय में ही होती है।

संकट परीक्षा है, दंड नहीं।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है जीवन की कीमत सिर्फ उसकी लंबाई में नहीं है।

हम अपने उपलब्ध समय के साथ क्या करते हैं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मृत्यु का विचार डराने के लिए नहीं, जीवन को अधिक जागरूक होकर देखने के लिए भी हो सकता है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

जीवन की कीमत सिर्फ उसकी लंबाई में नहीं है। हम अपने उपलब्ध समय के साथ क्या करते हैं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मृत्यु का विचार डराने के लिए नहीं, जीवन को अधिक जागरूक होकर देखने के लिए भी हो सकता है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक