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दूसरों को आगे बढ़ते देखकर मुझे लगता है कि मैं पीछे रह गया हूँ। मैं अपनी तुलना करना कैसे रोकूँ?

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

Kahi Reechhapati sunu Hanumana, ka chup sadhi raheu balawana. Pawan tanay bal pawan samana, budhi bibek bigyan nidhana. Kavan so kaaj kathin jag maahi, jo nahi hoi tat tumh pahi. Ram kaj lagi tav avatara, sunatahi bhayau parbatakara.

अर्थ

रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान! हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो। इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके? श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।

श्रीरामचरितमानस · Kishkindha Kand, Doha 30

कथा

हनुमान की भूली हुई शक्ति

कभी-कभी इंसान के पास सब कुछ होता है—काबिलियत भी, अनुभव भी, मेहनत करने की इच्छा भी—फिर भी वह खुद को छोटा समझने लगता है।

उसे लगता है, "शायद मैं नहीं कर पाऊँगा।

"

हनुमान की कहानी का यह हिस्सा मुझे इसी वजह से बहुत अपना-सा लगता है।

बचपन में हनुमान असाधारण रूप से शक्तिशाली थे।

उनकी ऊर्जा की कोई सीमा दिखाई नहीं देती थी।

वे ऋषियों के आश्रमों तक पहुँच जाते, उनकी साधना में बाधा डाल देते, उनकी वस्तुएँ इधर-उधर कर देते।

उनके मन में किसी को नुकसान पहुँचाने की इच्छा नहीं थी।

वे बालक थे, अपनी शक्ति को समझते ही नहीं थे।

पर उनकी शरारतें इतनी बढ़ गईं कि ऋषियों ने उन्हें शाप दिया कि वे कुछ समय तक अपनी शक्ति को स्वयं याद नहीं रख पाएँगे।

जब कोई उन्हें उनकी शक्ति और सामर्थ्य का स्मरण कराएगा, तब वह शक्ति फिर जाग उठेगी।

फिर समय बीत गया।

हनुमान बड़े हुए।

उनके भीतर वही सामर्थ्य था, लेकिन उन्हें अपनी उस शक्ति का पूरा बोध नहीं था।

वे सुग्रीव के साथ रहे, सेवा करते रहे, और जब श्रीराम से मिले तो भी उन्होंने अपने बारे में कोई बड़ा दावा नहीं किया।

फिर सीता माता की खोज का समय आया।

वानर-सेना दक्षिण दिशा में खोजते-खोजते समुद्र के किनारे पहुँच गई।

सामने बहुत बड़ा समुद्र था और दूसरी तरफ लंका।

अब सवाल था—जाए कौन?

सब अपनी-अपनी क्षमता बता रहे थे।

कोई अपनी सीमा बताता, कोई उससे थोड़ी आगे जाने की बात करता।

लेकिन हनुमान चुप बैठे थे।

यही इस कहानी का सबसे सुंदर हिस्सा है।

जिसके भीतर समुद्र पार करने की शक्ति थी, वही उस समय अपने बारे में सबसे कम सोच रहा था।

तभी जामवंत उनके पास आए।

उन्होंने हनुमान को डाँटा नहीं।

उन्होंने बस उन्हें उनकी अपनी कहानी याद दिलाई।

"कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।

का चुप साधि रहेहु बलवाना॥"

जैसे कोई अपने ही किसी पुराने दोस्त से कह रहा हो—"तुम चुप क्यों बैठे हो?

तुम भूल गए हो कि तुम कौन हो।

"

फिर जामवंत उन्हें उनकी शक्ति याद दिलाते हैं।

"कवन सो काज कठिन जग माहीं।

जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥"

अर्थ—इस संसार में ऐसा कौन-सा कठिन काम है जो तुमसे हो सके?

और फिर—

"राम काज लगि तव अवतारा।

सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥"

राम के कार्य के लिए तुम्हारा अवतार हुआ है—यह सुनते ही हनुमान का रूप पर्वत के समान विशाल हो गया।

सोचिए।

कुछ देर पहले वही हनुमान चुप बैठे थे।

अब वही हनुमान समुद्र पार करने के लिए तैयार खड़े थे।

उनकी शक्ति उस क्षण पैदा नहीं हुई थी।

वह शक्ति पहले से उनके भीतर थी।

बस उन्हें कोई ऐसा चाहिए था जो उन्हें उनकी अपनी शक्ति याद दिला दे।

और फिर हनुमान ने समुद्र की ओर छलांग लगा दी।

आगे सुंदरकांड में जब मैनाक पर्वत उन्हें विश्राम करने के लिए कहता है, हनुमान उसे सम्मान देते हैं, लेकिन रुकते नहीं।

उनका भाव बहुत सीधा है—

"राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।

"

राम का काम पूरा किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?

यहीं कहानी और गहरी हो जाती है।

पहले जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति याद दिलाई।

फिर हनुमान ने उस शक्ति को अपने लिए नहीं, राम के काम के लिए इस्तेमाल किया।

शायद यही इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात है।

मुझे इस कहानी में अपने लिए क्या दिखाई देता है?

शायद हमारे भीतर भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे हमने खोया नहीं है—बस भूल गए हैं।

कभी किसी असफलता के बाद।

कभी किसी रिश्ते के टूटने के बाद।

कभी किसी ने बार-बार कह दिया कि "तुमसे नहीं होगा।

"

और कभी-कभी बिना किसी वजह के हम खुद ही अपने बारे में छोटा सोचना शुरू कर देते हैं।

फिर धीरे-धीरे हम अपनी ही ताकत भूल जाते हैं।

लेकिन हनुमान की कहानी एक बात याद दिलाती है—

हर बार नई ताकत पैदा करना जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी जरूरत सिर्फ इतनी होती है कि कोई हमें हमारी अपनी ताकत याद दिला दे।

और शायद कभी-कभी वह आवाज़ बाहर से नहीं आती।

कभी वह हमारे भीतर से ही आती है।

एक बात याद रखिए

अगर आज आपको लग रहा है कि "मैं नहीं कर सकता", तो शायद यह अंतिम सच नहीं है।

हो सकता है आप थके हुए हों।

हो सकता है किसी चोट ने आपका भरोसा कम कर दिया हो।

हो सकता है आपने बहुत बार कोशिश करके हार मान ली हो।

लेकिन अपनी वर्तमान हालत को अपनी पूरी क्षमता मत समझिए।

हनुमान समुद्र के किनारे बैठे हुए भी हनुमान ही थे।

उनकी शक्ति कहीं गई नहीं थी।

उन्हें बस अपनी शक्ति की याद दिलाने वाला जामवंत चाहिए था।

और शायद जीवन में कभी-कभी हमें भी एक जामवंत की जरूरत होती है।

श्रीरामचरितमानस · Kishkindha Kand, Doha 30

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “दूसरों को आगे बढ़ते देखकर मुझे लगता है कि मैं पीछे रह गया हूँ।

मैं अपनी तुलना करना कैसे रोकूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है रीछराज जामवंत ने कहा सुनो हनुमान!

हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो?

तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो।

इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे हो सके?

श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है।

यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक