← वापस

यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

घर, काम, समाज --- हर तरफ से इतनी उम्मीदें और दबाव हैं कि मैं खुद के लिए सोच ही नहीं पाता।

श्लोक

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।

dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28

चौपाई / दोहा

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ावै साखा॥

hoihi soi jo Rama rachi rakha, ko kari tarka badhavai sakha

अर्थ

जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा — व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है। मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

द्रौपदी: जब जीवन आपके लिए फैसला कर दे

द्रौपदी का स्वयंवर समाप्त हुआ था।

अर्जुन उन्हें अपने साथ लेकर अपने भाइयों के पास पहुंचे।

कुंती ने बिना देखे कह दिया जो भी लाए हो, आपस में बांट लो।

उन्हें यह पता नहीं था कि अर्जुन क्या लेकर आए हैं।

जब उन्हें मालूम हुआ कि बात द्रौपदी की है, तब परिस्थिति अचानक बहुत जटिल हो गई।

एक शब्द निकल चुका था।

एक मां का वचन था।

और सामने द्रौपदी का पूरा जीवन था।

आगे चलकर द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी बनीं।

आज के नजरिए से देखें तो यह परिस्थिति बेहद असामान्य लगती है।

उस समय भी यह साधारण बात नहीं थी।

लेकिन द्रौपदी की पूरी कहानी सिर्फ इस विवाह-व्यवस्था की कहानी नहीं है।

उनकी पहचान इस बात से नहीं बनी कि उनकी जिंदगी कैसी परिस्थिति में चली गई।

उनकी पहचान बनी उनके स्वभाव से।

उनकी बुद्धि से।

उनके आत्मसम्मान से।

और उस साहस से जिसके कारण उन्होंने अन्याय के सामने सवाल पूछने से कभी पीछे हटना नहीं सीखा।

यही बात मुझे इस कहानी में महत्वपूर्ण लगती है।

हमारी जिंदगी में भी कई फैसले हमारे हाथ में नहीं होते।

कभी परिवार हमारे लिए फैसला करता है।

कभी परिस्थितियां हमें ऐसी जगह ले जाती हैं जिसकी हमने कल्पना नहीं की थी।

कभी शादी, नौकरी, बीमारी या आर्थिक स्थिति अचानक पूरी दिशा बदल देती है।

उस समय हम सोचते हैं

"अब मेरी जिंदगी मेरे हाथ में रही ही कहां?

"

शायद हर परिस्थिति हमारे हाथ में नहीं होती।

लेकिन उस परिस्थिति में हम कौन बनकर रहते हैं यह कुछ हद तक हमारे हाथ में जरूर होता है।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: रिश्तों का बोझ, परिवार का दबाव

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “घर, काम, समाज --- हर तरफ से इतनी उम्मीदें और दबाव हैं कि मैं खुद के लिए सोच ही नहीं पाता।

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो होना राम ने रच रखा है, वही होगा व्यर्थ के तर्कों से केवल उलझन बढ़ती है।

मन को इस भरोसे में टिकाना ही शांति का पहला कदम है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है परिस्थिति मेरी पूरी पहचान नहीं है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

परिस्थिति मेरी पूरी पहचान नहीं है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक