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उम्र के साथ मेरा शरीर, मेरे विचार, मेरी पसंद-नापसंद सब बदल गए हैं। फिर भी कुछ है जो वैसा ही रहा है। वो क्या है?

श्लोक

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।27।।

jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṁ janma mṛtasya cha tasmād aparihārye 'rthe na tvaṁ śhochitum arhasi

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.27

चौपाई / दोहा

परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

parahita sarisa dharama nahin bhai, para pira sama nahin adhamai

अर्थ

दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं। मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

शकुंतला: जब अपना ही कोई आपको पहचानने से इनकार कर दे

शकुंतला का जीवन एक आश्रम में बीता था।

वहीं उनकी मुलाकात राजा दुष्यंत से हुई।

दोनों के बीच प्रेम हुआ।

उनका विवाह हुआ और दुष्यंत ने लौटकर उन्हें अपने साथ ले जाने का वचन दिया।

लेकिन समय बीतता गया।

दुष्यंत वापस नहीं आए।

शकुंतला के लिए इंतजार आसान नहीं था।

फिर वह समय आया जब उन्हें अपने पुत्र के साथ राजमहल जाना पड़ा।

रास्ते में उनकी अंगूठी नदी में गिर गई।

वही अंगूठी उनके विवाह और दुष्यंत से जुड़े संबंध की पहचान थी।

जब वह राजदरबार पहुंचीं, तो दुष्यंत ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया।

सोचिए, उस समय शकुंतला पर क्या गुजरी होगी।

जिस व्यक्ति से उन्होंने प्रेम किया।

जिसके साथ विवाह किया।

जिससे उन्हें उम्मीद थी कि वह उन्हें स्वीकार करेगा।

वही व्यक्ति अब कह रहा था मैं तुम्हें नहीं जानता।

किसी इंसान के लिए इससे ज्यादा अकेला क्षण क्या होगा?

शकुंतला के पास अपना सच था, लेकिन सामने वाला उस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।

वह राजमहल से चली गईं।

उन्होंने अपने जीवन और अपने पुत्र को संभाला।

फिर समय बदला।

वह अंगूठी एक मछुआरे को मिली और अंततः दुष्यंत तक पहुंची।

अंगूठी देखते ही उनकी स्मृति लौट आई।

जो बात इतनी देर तक अस्वीकार की गई थी, वह फिर सामने गई।

दुष्यंत ने शकुंतला और उनके पुत्र को स्वीकार किया।

लेकिन इस कहानी को सिर्फ "अंत में सब ठीक हो गया" कहकर छोड़ देना सही नहीं होगा।

क्योंकि बीच का वह समय भी सच था।

वह अपमान सच था।

वह अकेलापन सच था।

वह इंतजार भी सच था।

हमारी जिंदगी में भी कभी-कभी कोई हमें गलत समझ लेता है।

कभी कोई अपना हमें छोड़ देता है।

कभी किसी रिश्ते में हमारी बात सुनी ही नहीं जाती।

और हम सोचते रहते हैं क्या सच में मुझमें ही कमी थी?

शकुंतला की कथा हमें एक बात याद दिलाती है किसी दूसरे व्यक्ति का हमें स्वीकार करना या करना, हमेशा हमारी पूरी सच्चाई तय नहीं करता।

कभी-कभी सामने वाले के पास पूरी जानकारी नहीं होती।

कभी परिस्थिति बीच में जाती है।

और कभी सच को सामने आने में समय लगता है।

Linked wisdom: Kalidasa's Abhijnanashakuntalam / Mahabharata, Adi Parva — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: अस्वीकृति, पहचान खो गई, रिश्तों का टूटना

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “उम्र के साथ मेरा शरीर, मेरे विचार, मेरी पसंद-नापसंद सब बदल गए हैं।

फिर भी कुछ है जो वैसा ही रहा है।

वो क्या है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।

मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है किसी की अस्वीकृति से तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना कि मैं ही गलत हूं।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

किसी की अस्वीकृति से तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना कि मैं ही गलत हूं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक