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मुझे मृत्यु के बारे में सोचकर डर तो नहीं लगता, लेकिन एक अनजानापन जरूर महसूस होता है। यह अनिश्चितता कैसे समझूं?
श्लोक
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63
चौपाई / दोहा
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
moha sakala byadhinha kara mula, tinha te puni upajahin bahu shula
अर्थ
मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
मनु और मछली: जब आने वाले खतरे को समय रहते समझ लिया जाए
मनु नदी के किनारे थे।
वहां उन्हें एक छोटी-सी मछली दिखाई दी।
मछली ने जैसे उनसे सहायता मांगी — बड़ी मछलियां उसे खा सकती थीं।
मनु ने उसे बचाने का फैसला किया।
उन्होंने मछली को अपने पात्र में रख लिया।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
मछली तेजी से बड़ी होने लगी।
पात्र छोटा पड़ गया।
उसे बड़े स्थान पर रखा गया।
फिर वह स्थान भी छोटा पड़ गया।
आखिरकार मनु को समझ आया कि यह कोई साधारण मछली नहीं है।
कथा में यही मछली भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार के रूप में सामने आती है।
फिर मनु को आने वाले प्रलय की चेतावनी दी गई।
उन्हें बताया गया कि एक बड़ी बाढ़ आने वाली है और उन्हें पहले से तैयारी करनी होगी।
सोचिए — किसी को ऐसी बात बता दी जाए कि भविष्य में बहुत बड़ा संकट आने वाला है, लेकिन अभी चारों तरफ सब सामान्य दिखाई दे रहा हो।
हममें से कितने लोग सचमुच तैयारी शुरू करेंगे?
अक्सर नहीं।
हम कहते हैं —
"अभी तो कुछ हुआ ही नहीं।
"
"देखेंगे जब जरूरत पड़ेगी।
"
"अभी इसकी क्या जरूरत है?
"
मनु ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने तैयारी शुरू कर दी।
कथा के अनुसार जब प्रलय आई, तो वही तैयारी जीवन को बचाने का आधार बनी।
इस कहानी को सिर्फ प्रलय की कथा की तरह पढ़ना एक तरीका है।
लेकिन इसे अपने जीवन से जोड़कर देखें तो बात बहुत सीधी है।
कभी शरीर पहले से संकेत देता है।
कभी रिश्ते में दरार दिखाई देने लगती है।
कभी व्यापार में नुकसान लगातार बढ़ रहा होता है।
कभी नौकरी की स्थिति बदल रही होती है।
कभी मन खुद कह रहा होता है कि कुछ ठीक नहीं है।
हम अक्सर इन संकेतों को तब तक नजरअंदाज करते रहते हैं जब तक संकट हमारे सामने खड़ा न हो जाए।
Linked wisdom: Matsya tradition / Shatapatha Brahmana / Matsya Purana — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: भविष्य का डर, अनिश्चितता
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मुझे मृत्यु के बारे में सोचकर डर तो नहीं लगता, लेकिन एक अनजानापन जरूर महसूस होता है।
यह अनिश्चितता कैसे समझूं?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — मोह ही सब रोगों की जड़ है, उसी से अनेक पीड़ाएँ जन्म लेती हैं।
पकड़ ढीली होते ही दुःख हल्का होने लगता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर डर सच नहीं होता, लेकिन हर चेतावनी को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर डर सच नहीं होता, लेकिन हर चेतावनी को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
