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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

कभी समय बहुत धीरे चलता महसूस होता है, कभी पलक झपकते निकल जाता है। असल में समय क्या है --- क्या यह सच में है भी या सिर्फ हमारा एहसास है?

श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham

श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7

चौपाई / दोहा

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥

jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu

अर्थ

जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

अपना ही मित्र, अपना ही शत्रु

गीता में एक जगह कृष्ण अर्जुन से ऐसी बात कहते हैं जो पहली बार सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है—

इंसान खुद अपना मित्र भी बन सकता है और खुद अपना शत्रु भी।

यह बात ध्यान और आत्म-संयम की चर्चा के बीच आती है, लेकिन इसका संबंध हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से भी बहुत गहरा है।

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी सबसे बड़ी लड़ाई बाहर है।

किसी दूसरे इंसान से।

किसी परिस्थिति से।

पैसों से।

नौकरी से।

परिवार से।

लेकिन कई बार सबसे कठिन लड़ाई अपने ही मन के साथ चल रही होती है।

कोई छोटी-सी गलती होती है और हम घंटों खुद को कोसते रहते हैं।

कोई मौका हाथ से निकल जाता है और हम महीनों तक अपने आपको माफ नहीं कर पाते।

किसी दूसरे की सफलता देखते हैं और मन में आता है—“मैं क्यों नहीं?

फिर धीरे-धीरे हमारे भीतर एक ऐसी आवाज बनने लगती है जो हर समय हमें कमतर बताती रहती है।

कृष्ण कहते हैं—

“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।

मनुष्य को अपने ही प्रयास से अपने आपको ऊपर उठाना चाहिए, खुद को नीचे नहीं गिराना चाहिए।

आगे कृष्ण कहते हैं—

“बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।

जिसने अपने मन को साध लिया है, उसके लिए वही मन मित्र बन जाता है।

बात बहुत सीधी है।

जिस तरह हम किसी अपने दोस्त से बात करते हैं, क्या हम खुद से भी वैसे ही बात करते हैं?

अगर हमारा कोई दोस्त असफल हो जाए, तो हम शायद उसे कहेंगे—

“कोई बात नहीं, फिर कोशिश करना।

लेकिन जब वही गलती हमसे होती है तो अपने आप से कहते हैं—

“तुमसे कभी कुछ नहीं होगा।

यहीं से फर्क शुरू होता है।

अपने मन को अपना मित्र बनाने का मतलब यह नहीं कि हम अपनी गलतियों को सही मान लें।

मतलब यह है कि गलती होने पर खुद को तोड़ने के बजाय खुद को संभालें।

यह बदलाव एक दिन में नहीं आता।

लेकिन यह समझना कि मेरे मन की हर आवाज सच नहीं होती, एक बहुत बड़ी शुरुआत हो सकती है।

मुझे इससे क्या सीखना है?

जो आवाज मुझे लगातार नीचा दिखाती है, वह जरूरी नहीं कि मेरी सच्चाई हो।

हो सकता है वह सिर्फ मेरे मन की पुरानी आदत हो।

और आदत बदली जा सकती है।

अब मुझे क्या करना है?

जब भी खुद की आलोचना बहुत तीखी हो जाए, एक पल रुककर खुद से पूछना है—

“अगर मेरा सबसे अच्छा दोस्त इसी स्थिति में होता, तो मैं उससे क्या कहता?

फिर वही बात अपने आप से कहने की कोशिश करनी है।

श्रीमद्भगवद्गीता

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “कभी समय बहुत धीरे चलता महसूस होता है, कभी पलक झपकते निकल जाता है।

असल में समय क्या है --- क्या यह सच में है भी या सिर्फ हमारा एहसास है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है इसमें संदेह नहीं।

सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक