← वापस

यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

यह सारी सृष्टि --- पेड़, नदियां, पहाड़, इंसान --- इतनी व्यवस्थित तरीके से कैसे बनी? क्या इसके पीछे कोई सोची-समझी योजना है?

श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।

sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66

चौपाई / दोहा

परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

parahita sarisa dharama nahin bhai, para pira sama nahin adhamai

अर्थ

दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं। मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

जनक: जब जिम्मेदारियों के बीच भी मन शांत रह सकता है

राजा जनक के पास वह सब था जिसे दुनिया सफलता मानती है।

राज्य था।

धन था।

परिवार था।

जिम्मेदारियां थीं।

फिर भी उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है जो भीतर से बहुत गहरे ज्ञानी और स्थिर थे।

यही बात लोगों को चौंकाती थी।

आखिर कोई व्यक्ति इतनी सारी जिम्मेदारियों के बीच भीतर से शांत कैसे रह सकता है?

जनक से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा में एक परीक्षा का वर्णन मिलता है।

उन्हें सिर पर तेल से भरा कटोरा रखकर चलना था।

आसपास ऐसी स्थिति बनाई गई थी कि उनका पूरा ध्यान कटोरे पर रहे।

अगर तेल की एक बूंद भी गिरती, तो परीक्षा असफल मानी जाती।

जनक ने पूरा ध्यान उसी कटोरे पर रखा।

बाद में जब उनसे रास्ते में दिखाई देने वाली चीजों के बारे में पूछा गया, तो उनका ध्यान इतना केंद्रित था कि वे बाहरी विवरणों से लगभग अनजान थे।

यह कथा एक उदाहरण देती है—

दुनिया में रहते हुए भी मन को हर चीज में उलझाना जरूरी नहीं।

आज हमारी जिंदगी में इसका दूसरा रूप दिखाई देता है।

काम कर रहे हैं तो मोबाइल बीच में जाता है।

परिवार के साथ हैं तो ऑफिस की चिंता चल रही है।

ऑफिस में हैं तो घर की चिंता।

सोने जाते हैं तो कल की चिंता।

एक जगह शरीर होता है और मन दस जगह।

जनक की कथा हमें किसी जिम्मेदारी से भागने के लिए नहीं कहती।

बल्कि शायद यह पूछती है—

क्या मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाते हुए भी अपने मन को हर छोटी चीज से खिंचने से बचा सकता हूं?

महाभारत · Linked wisdom: to be verse-verified — Mahabharata (Shanti Parva), Brihadaranyaka Upanishad references | Evidence: traditional | Topics: गृहस्थ जीवन, वैराग्य, संतुलन

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “यह सारी सृष्टि --- पेड़, नदियां, पहाड़, इंसान --- इतनी व्यवस्थित तरीके से कैसे बनी?

क्या इसके पीछे कोई सोची-समझी योजना है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।

मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है वैराग्य का अर्थ हमेशा सब कुछ छोड़ देना नहीं है।

कभी-कभी वैराग्य का अर्थ है—सब कुछ करते हुए भी यह समझना कि हर चीज मेरे मन पर अधिकार नहीं रखती।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

वैराग्य का अर्थ हमेशा सब कुछ छोड़ देना नहीं है। कभी-कभी वैराग्य का अर्थ है—सब कुछ करते हुए भी यह समझना कि हर चीज मेरे मन पर अधिकार नहीं रखती।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक