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कभी-कभी लगता है जो मैं सच मानकर जी रहा हूँ, वो सिर्फ मेरी सोच का भ्रम है। असली और भ्रम में फर्क कैसे करूं?
श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47
चौपाई / दोहा
जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥
jaki rahi bhavana jaisi, prabhu murati dekhi tina taisi
अर्थ
जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है। बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
शिव धनुष: जब असंभव सामने खड़ा हो
मिथिला में सीता स्वयंवर की तैयारी थी।
दूर-दूर से राजा और राजकुमार आए थे।
सब जानते थे कि यह कोई साधारण स्वयंवर नहीं है।
राजा जनक ने एक कठिन शर्त रखी थी — जो शिव के विशाल धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सके, वही सीता का वरण करेगा।
धनुष सभा के बीच रखा था।
उसे देखकर ही अंदाज़ा हो जाता था कि यह काम आसान नहीं होने वाला।
एक-एक करके बड़े-बड़े राजा आगे आए।
किसी ने उसे उठाने की कोशिश की।
किसी ने पूरी ताकत लगा दी।
किसी ने प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया।
लेकिन कोई सफल नहीं हुआ।
धीरे-धीरे सभा में एक अजीब-सी चुप्पी आने लगी।
जब इतने शक्तिशाली लोग असफल हो गए, तो बाकी लोग कोशिश करने से पहले ही अपने मन में हारने लगे।
यही तो हमारे साथ भी होता है।
हम किसी काम को इसलिए असंभव मान लेते हैं क्योंकि हमने देखा है कि दूसरे लोग उसमें असफल हुए हैं।
फिर राम आगे बढ़े।
न कोई दिखावा।
न कोई घोषणा।
न यह साबित करने की कोशिश कि मैं सबसे शक्तिशाली हूं।
वे शांत भाव से धनुष के पास गए।
उन्होंने उसे उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया।
धनुष टूट गया।
पूरी सभा स्तब्ध रह गई।
राम ने कोई विजय-घोष नहीं किया।
जैसे उन्होंने कुछ असाधारण किया ही न हो।
मुझे इस कहानी में सबसे सुंदर बात यही लगती है।
कभी-कभी हमारा सबसे बड़ा अवरोध सामने खड़ी कठिनाई नहीं होती।
हमारे मन में पहले से बनी हुई वह धारणा होती है कि "यह मेरे बस का नहीं है।
"
नौकरी के लिए आवेदन करने से पहले ही लगता है कि मुझे कौन चुनेगा।
व्यवसाय शुरू करने से पहले लगता है कि मेरे पास दूसरों जितने पैसे नहीं हैं।
किसी रिश्ते में अपनी बात कहने से पहले लगता है कि सामने वाला समझेगा ही नहीं।
और धीरे-धीरे हम कोशिश करना ही छोड़ देते हैं।
राम की कहानी यह नहीं कहती कि हर असंभव काम हम कर सकते हैं।
वह बस इतना याद दिलाती है कि दूसरों की सीमा हमेशा हमारी सीमा नहीं होती।
Linked wisdom: to be verse-verified — Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Bala Kanda | Evidence: traditional | Topics: आत्मसंशय, उद्देश्यहीनता, साहस
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “कभी-कभी लगता है जो मैं सच मानकर जी रहा हूँ, वो सिर्फ मेरी सोच का भ्रम है।
असली और भ्रम में फर्क कैसे करूं?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है।
बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — जिस काम को मैं असंभव मानकर बैठा हूं, उसके बारे में एक बार ईमानदारी से देखना है — क्या वह सचमुच असंभव है, या मैंने कोशिश करने से पहले ही अपने लिए फैसला कर लिया है?
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
जिस काम को मैं असंभव मानकर बैठा हूं, उसके बारे में एक बार ईमानदारी से देखना है — क्या वह सचमुच असंभव है, या मैंने कोशिश करने से पहले ही अपने लिए फैसला कर लिया है?
ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
