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नर्क की बातें सुनकर कभी-कभी अपनी गलतियों को लेकर डर लगने लगता है। क्या नर्क सज़ा है या सिर्फ हमारे ही कर्मों का प्रतिबिंब?
श्लोक
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।62।।
dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho 'bhijāyate
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.62
चौपाई / दोहा
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
binu satasanga bibeka na hoi, Rama kripa binu sulabha na soi
अर्थ
सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता। उलझन में अकेले मत बैठिए — सच्चे लोगों का साथ ही रास्ता खोलता है।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
ययाति: जब चाहत पूरी होती जाए, फिर भी मन खाली रहे
राजा ययाति को एक श्राप के कारण समय से पहले वृद्धावस्था मिल गई।
लेकिन शरीर बूढ़ा हो गया था, मन नहीं।
उनकी इच्छाएं अभी भी वैसी ही थीं।
उन्होंने अपने पुत्रों से पूछा कि क्या कोई उन्हें अपनी युवावस्था दे सकता है और बदले में उनका बुढ़ापा ले सकता है।
पुरु तैयार हो गए।
ययाति को फिर से युवावस्था मिल गई।
अब उनके पास वही चीज थी जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा इच्छा थी।
उन्होंने भोग किया।
सुख लिया।
इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश की।
लेकिन एक इच्छा पूरी होती तो दूसरी खड़ी हो जाती।
फिर तीसरी।
फिर चौथी।
और धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि समस्या किसी एक इच्छा में नहीं थी।
समस्या यह थी कि मन कह रहा था —
"बस यह मिल जाए, फिर मैं संतुष्ट हो जाऊंगा।
"
लेकिन वह "बस यह" कभी खत्म नहीं हुआ।
कथा में ययाति अंततः इस अनुभव तक पहुंचे कि इच्छाओं को सिर्फ भोगते रहने से वे खत्म नहीं होतीं।
हमारी जिंदगी में इसका एक बहुत साधारण रूप दिखाई देता है।
"बस नौकरी लग जाए।
"
फिर — "बस प्रमोशन मिल जाए।
"
फिर — "बस अपना घर हो जाए।
"
फिर — "बस थोड़ा और पैसा हो जाए।
"
फिर — "अब सब ठीक होगा।
"
लेकिन मन फिर अगली चीज खोज लेता है।
इसका मतलब यह नहीं कि इच्छा रखना गलत है।
समस्या तब शुरू होती है जब हमारी पूरी खुशी किसी अगली उपलब्धि पर टिकी होती है।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: संतोष, इच्छा, वैराग्य
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “नर्क की बातें सुनकर कभी-कभी अपनी गलतियों को लेकर डर लगने लगता है।
क्या नर्क सज़ा है या सिर्फ हमारे ही कर्मों का प्रतिबिंब?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता।
उलझन में अकेले मत बैठिए — सच्चे लोगों का साथ ही रास्ता खोलता है।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर इच्छा पूरी करना और संतुष्ट होना एक ही बात नहीं है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर इच्छा पूरी करना और संतुष्ट होना एक ही बात नहीं है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
