यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
मोक्ष का मतलब जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति है, ऐसा सुना है। लेकिन इस चक्र से मुक्त होकर आगे क्या रहता है, यह कल्पना करना मुश्किल है।
श्लोक
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63
चौपाई / दोहा
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
Kahi Reechhapati sunu Hanumana, ka chup sadhi raheu balawana. Pawan tanay bal pawan samana, budhi bibek bigyan nidhana. Kavan so kaaj kathin jag maahi, jo nahi hoi tat tumh pahi. Ram kaj lagi tav avatara, sunatahi bhayau parbatakara.
अर्थ
रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान! हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो। इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके? श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।
श्रीरामचरितमानस · Kishkindha Kand, Doha 30
कथा
भीम और बकासुर: जब किसी की मदद करने के लिए आगे आना पड़े
वनवास के दौरान पांडव एकचक्रा नाम के नगर में रह रहे थे।
वे अपनी पहचान छिपाकर एक साधारण परिवार के यहां ठहरे हुए थे।
एक दिन कुंती ने उस घर में रोने की आवाज सुनी।
उन्होंने पूछा तो पता चला कि पूरा नगर बकासुर नाम के राक्षस से परेशान था।
कथा के अनुसार नगर के लोगों को बारी-बारी से भोजन और एक व्यक्ति उसके पास भेजना पड़ता था।
अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो वह पूरे नगर को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता था।
उस दिन उस परिवार की बारी थी।
घर में हर कोई परेशान था।
किसे भेजें?
पिता जाएं?
मां जाए?
बेटा जाए?
कोई भी फैसला लेने को तैयार नहीं था।
कुंती ने उनकी परेशानी सुनी।
फिर उन्होंने कहा कि उनके पुत्रों में से एक यह काम कर देगा।
भीम आगे आए।
उन्होंने डरकर पीछे हटने के बजाय जाने का फैसला किया।
वह भोजन से भरी गाड़ी लेकर बकासुर के पास पहुंचे।
कथा के अनुसार रास्ते में उन्होंने भोजन खुद खाना शुरू कर दिया।
बकासुर आया तो दोनों के बीच युद्ध हुआ।
भीम ने उसका सामना किया और अंततः उसका वध कर दिया।
नगर उस भय से मुक्त हो गया।
लेकिन जिस बात पर ध्यान देना चाहिए, वह यह है कि भीम ने यह काम प्रसिद्धि के लिए नहीं किया।
उन्होंने किसी मंच पर जाकर नहीं कहा — "देखो, मैंने तुम्हें बचाया।
"
वे अपनी पहचान छिपाकर ही वहां से चले गए।
हमारे जीवन में भी कभी-कभी कोई ऐसा व्यक्ति हमारे सामने आता है जिसे मदद की जरूरत होती है।
कोई सहकर्मी मुश्किल में है।
किसी पड़ोसी की समस्या है।
परिवार में कोई अकेला पड़ गया है।
हम सोचते हैं — "मैं क्यों बीच में पड़ूं?
"
लेकिन हर बार मदद करने का मतलब बड़ी चीज करना नहीं होता।
कभी किसी के लिए खड़ा होना ही पर्याप्त होता है।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: साहस, सुरक्षा, सेवा
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मोक्ष का मतलब जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति है, ऐसा सुना है।
लेकिन इस चक्र से मुक्त होकर आगे क्या रहता है, यह कल्पना करना मुश्किल है।
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान!
हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो?
तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो।
इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके?
श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है।
यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — मदद की असली कीमत तब पता चलती है जब उसके बदले में हमें कुछ नहीं चाहिए।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
मदद की असली कीमत तब पता चलती है जब उसके बदले में हमें कुछ नहीं चाहिए।

ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
