← वापस

यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

किसी अपने से आखिरी विदाई लेना सबसे मुश्किल पलों में से एक होता है। इस विदाई को सम्मान के साथ कैसे स्वीकारूं?

श्लोक

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।।28।।

dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam sīdanti mama gātrāṇi mukhaṁ cha pariśhuṣhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.28

चौपाई / दोहा

सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥

saba kara mata khaganayaka eha, karia Rama pada pankaja neha

अर्थ

सबका मत यही है — राम के चरणों में प्रेम कीजिए। जब कुछ समझ न आए, तब श्रद्धा ही सबसे सरल रास्ता है।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

नीलकंठ: जब दर्द को अकेले सहना जरूरी नहीं

समुद्र मंथन चल रहा था।

देवता और असुर अमृत पाने के लिए समुद्र को मथ रहे थे।

सबकी नजर अमृत पर थी।

लेकिन अमृत से पहले कुछ ऐसा निकला जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी हलाहल विष।

वह विष इतना भयंकर था कि पूरी सृष्टि के लिए खतरा पैदा हो गया।

देवता परेशान हो गए।

असुर भी पीछे हट गए।

जिसे देखकर सब अमृत की उम्मीद कर रहे थे, वही अब विनाश का कारण बनता दिखाई दे रहा था।

कोई रास्ता समझ नहीं रहा था।

आखिर सब भगवान शिव के पास पहुंचे।

शिव ने उस विष को अपने ऊपर लेने का निर्णय किया।

उन्होंने हलाहल को पी लिया, लेकिन उसे निगला नहीं।

उन्होंने उसे अपने कंठ में रोक लिया।

विष की तीव्रता से उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से उन्हें नीलकंठ कहा गया।

इस कथा में एक बात मुझे बहुत मानवीय लगती है।

शिव ने सिर्फ विष नहीं लिया।

उन्होंने एक ऐसी समस्या अपने ऊपर ली जिसे बाकी सभी लोग संभाल नहीं पा रहे थे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दर्द उनके लिए आसान था।

विष का असर था।

पीड़ा थी।

और तभी पार्वती उनके पास आईं।

उन्होंने शिव के कंठ को थाम लिया ताकि विष नीचे जाए।

यहीं कहानी बदल जाती है।

क्योंकि त्याग का मतलब यह नहीं कि इंसान को हर दर्द अकेले सहना चाहिए।

हमारी जिंदगी में भी कभी-कभी ऐसा होता है।

घर की जिम्मेदारी है।

किसी अपने की बीमारी है।

पैसों की परेशानी है।

बच्चों की चिंता है।

नौकरी का तनाव है।

हम सबको संभालने की कोशिश करते रहते हैं और किसी से कुछ कहते नहीं।

बाहर से लोग कहते हैं "आप तो बहुत मजबूत हैं।

"

और अंदर से इंसान सोचता है कब तक?

नीलकंठ की कथा हमें सिर्फ दूसरों के लिए सहने की बात नहीं बताती।

यह यह भी याद दिलाती है कि सबसे मजबूत व्यक्ति को भी साथ की जरूरत होती है।

पार्वती का हाथ उस कहानी में छोटा-सा हिस्सा लग सकता है, लेकिन उसका अर्थ बहुत बड़ा है।

किसी के पास बैठ जाना।

उसका दर्द समझना।

उसका बोझ थोड़ा थाम लेना।

कभी-कभी यही सबसे बड़ी मदद होती है।

Linked wisdom: Samudra Manthan / Neelkanth episode — Puranic tradition; citation-level verification pending | Evidence: traditional | Topics: दर्द, त्याग, प्रियजन की बीमारी

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “किसी अपने से आखिरी विदाई लेना सबसे मुश्किल पलों में से एक होता है।

इस विदाई को सम्मान के साथ कैसे स्वीकारूं?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है सबका मत यही है राम के चरणों में प्रेम कीजिए।

जब कुछ समझ आए, तब श्रद्धा ही सबसे सरल रास्ता है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है दूसरों के लिए जिम्मेदारी निभाना अच्छी बात है, लेकिन अपने दर्द को हमेशा छिपाकर रखना जरूरी नहीं।

मजबूत होने का मतलब यह नहीं कि किसी की जरूरत ही पड़े।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

दूसरों के लिए जिम्मेदारी निभाना अच्छी बात है, लेकिन अपने दर्द को हमेशा छिपाकर रखना जरूरी नहीं। मजबूत होने का मतलब यह नहीं कि किसी की जरूरत ही न पड़े।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक