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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

आकाश को देखकर हमेशा एक अजीब सी विशालता और शांति महसूस होती है। क्या आकाश और हमारे मन की शांति में कोई गहरा संबंध है?

श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।

sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66

चौपाई / दोहा

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

Kahi Reechhapati sunu Hanumana, ka chup sadhi raheu balawana. Pawan tanay bal pawan samana, budhi bibek bigyan nidhana. Kavan so kaaj kathin jag maahi, jo nahi hoi tat tumh pahi. Ram kaj lagi tav avatara, sunatahi bhayau parbatakara.

अर्थ

रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान! हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो। इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके? श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।

श्रीरामचरितमानस · Kishkindha Kand, Doha 30

कथा

तत् त्वम् असि: जब श्वेतकेतु को समझ आया कि ज्ञान सिर्फ जानना नहीं है

श्वेतकेतु बारह वर्षों तक गुरुकुल में पढ़कर अपने पिता उद्दालक के पास लौटे।

उन्होंने बहुत कुछ सीखा था।

वेद पढ़े थे।

शास्त्र पढ़े थे।

ज्ञान अर्जित किया था।

और उन्हें अपने ज्ञान पर गर्व भी था।

पिता ने उन्हें देखकर एक अलग तरह का सवाल पूछा—

"क्या तुमने वह जाना है, जिसे जान लेने पर बाकी सबको जानने की दिशा समझ में जाए?

"

श्वेतकेतु चुप हो गए।

इतना पढ़ने के बाद भी वे इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए।

तब उद्दालक ने उन्हें समझाना शुरू किया।

उन्होंने मिट्टी का उदाहरण दिया।

मिट्टी का एक टुकड़ा जान लेने पर मिट्टी से बने बहुत से बर्तनों का मूल समझा जा सकता है।

नाम अलग हैं, आकार अलग हैं, लेकिन मूल तत्व एक है।

फिर सोने का उदाहरण आया।

फिर नदियों का समुद्र में मिल जाना।

फिर छोटे से बीज के भीतर छिपे विशाल वृक्ष की संभावना।

धीरे-धीरे श्वेतकेतु समझने लगे कि बाहरी रूप अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके पीछे कोई गहरी एकता हो सकती है।

तब उद्दालक ने वह प्रसिद्ध वाक्य कहा—

"तत् त्वम् असि" वह तुम हो।

यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था।

यह श्वेतकेतु की पूरी सोच को भीतर से बदलने वाला बोध था।

हम भी अपनी पहचान कितनी चीजों से जोड़ लेते हैं।

मैं डॉक्टर हूं।

मैं शिक्षक हूं।

मैं व्यापारी हूं।

मैं सफल हूं।

मैं असफल हूं।

मैं किसी का बेटा हूं।

मैं किसी की पत्नी हूं।

मैं किसी का पिता हूं।

लेकिन अगर ये सारी भूमिकाएं एक दिन बदल जाएं तो?

तब बचता कौन है?

शायद यही वह सवाल है जिसके सामने श्वेतकेतु को खड़ा किया गया था।

उपनिषद् · Linked wisdom: तत् त्वम् असि — Chandogya Upanishad 6.8.7 | Evidence: scriptural (mantra); traditional (narrative frame) | Topics: आत्मिक खोज, मैं कौन हूं

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “आकाश को देखकर हमेशा एक अजीब सी विशालता और शांति महसूस होती है।

क्या आकाश और हमारे मन की शांति में कोई गहरा संबंध है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है रीछराज जामवंत ने कहा सुनो हनुमान!

हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो?

तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो।

इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे हो सके?

श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है।

यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हमारी पहचान सिर्फ हमारी नौकरी, पैसा, रिश्ते या उपलब्धियां नहीं हैं।

अपने बारे में गहराई से पूछना भी जीवन की एक महत्वपूर्ण यात्रा है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हमारी पहचान सिर्फ हमारी नौकरी, पैसा, रिश्ते या उपलब्धियां नहीं हैं। अपने बारे में गहराई से पूछना भी जीवन की एक महत्वपूर्ण यात्रा है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक