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कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि सही रास्ता चुनना मुश्किल हो जाता है और गलत रास्ता आसान लगने लगता है। इस खिंचाव से कैसे बचूं?
श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47
चौपाई / दोहा
सकल पदारथ हैं जग माहीं। करमहीन नर पावत नाहीं॥
sakala padaratha hain jaga mahin, karamahina nara pavata nahin
अर्थ
संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता। हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
राम का वनवास: जब जीवन अचानक आपकी योजना बदल दे
अयोध्या में उत्सव की तैयारी थी।
राम का राज्याभिषेक होने वाला था।
शहर सज चुका था।
लोग खुश थे।
राम स्वयं भी उस समय यह सोच रहे होंगे कि अब जीवन एक नए चरण में प्रवेश करेगा।
लेकिन उसी रात सब बदल गया।
कैकेयी ने दशरथ से अपने पुराने दो वरदान मांग लिए।
पहला — राम को चौदह वर्ष का वनवास।
दूसरा — भरत को राजगद्दी।
दशरथ टूट गए।
जिस बेटे का राज्याभिषेक होने वाला था, उसी बेटे को अगले दिन वन भेजना था।
जब राम को यह बात बताई गई, तो उनके सामने बहुत सारे रास्ते थे।
वे विरोध कर सकते थे।
वे कह सकते थे कि यह अन्याय है।
वे प्रजा से समर्थन मांग सकते थे।
लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने बस पिता के वचन को देखा।
और कहा —
"यदि यह पिताजी का वचन है, तो मैं वन जाऊंगा।
"
इसके बाद सीता ने कहा कि वे भी साथ जाएंगी।
लक्ष्मण भी साथ चल पड़े।
और जिस व्यक्ति के लिए अगले दिन राजतिलक होना था, वह उसी रात राजमहल छोड़कर वन की ओर निकल गया।
मुझे इस कहानी में सबसे मानवीय बात यही लगती है।
कई बार हमारी जिंदगी भी ऐसी ही होती है।
हमने कुछ सोचा होता है।
हमने योजना बनाई होती है।
हमें लगता है अब सब ठीक हो जाएगा।
और फिर अचानक कोई फोन आता है।
कोई नौकरी चली जाती है।
कोई रिश्ता टूट जाता है।
कोई बीमारी सामने आ जाती है।
कोई ऐसा फैसला हो जाता है जो हमारे हाथ में नहीं था।
हमारे पास दो रास्ते होते हैं —
या तो हम लगातार यही सोचते रहें कि "ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ?
"
या फिर यह पूछें —
"अब इस परिस्थिति में मेरा सही अगला कदम क्या है?
"
राम की कहानी हमें दूसरा रास्ता दिखाती है।
Linked wisdom: Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Ayodhya Kand; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: कर्तव्य, रिश्तों का बोझ, परिवार का दबाव
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि सही रास्ता चुनना मुश्किल हो जाता है और गलत रास्ता आसान लगने लगता है।
इस खिंचाव से कैसे बचूं?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता।
हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर परिस्थिति हमारे अनुसार नहीं बदलेगी।
लेकिन परिस्थिति बदलने के बाद हम कैसे खड़े होते हैं, यह बहुत हद तक हमारे हाथ में रहता है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर परिस्थिति हमारे अनुसार नहीं बदलेगी। लेकिन परिस्थिति बदलने के बाद हम कैसे खड़े होते हैं, यह बहुत हद तक हमारे हाथ में रहता है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
