यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
सच बोलने से कभी-कभी किसी को गहरी चोट पहुंच सकती है। ऐसे में सच बोलना सही है या चुप रहना बेहतर?
श्लोक
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।62।।
dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho 'bhijāyate
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.62
चौपाई / दोहा
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥
jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu
अर्थ
जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
गणेश और वेदव्यास: जब काम बड़ा हो, तो बुद्धि भी साथ चाहिए
महर्षि वेदव्यास के सामने एक बहुत बड़ा काम था।
महाभारत की कथा उनके मन में थी — इतनी विशाल कि उसे लिखने का काम भी साधारण नहीं था।
उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उनके साथ बैठकर लगातार लिख सके।
उन्होंने भगवान गणेश से सहायता मांगी।
गणेश तैयार हुए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रख दी।
उन्होंने कहा — मैं लिखूंगा, लेकिन मेरी कलम एक बार चलने के बाद रुकनी नहीं चाहिए।
अगर आप बोलते-बोलते रुक गए, तो मैं आगे नहीं लिखूंगा।
अब मुश्किल समझिए।
वेदव्यास को लगातार बोलना था।
इतना बड़ा ग्रंथ रचना था और सामने ऐसा लेखक था जो एक पल भी रुकने को तैयार नहीं था।
लेकिन वेदव्यास ने भी तुरंत हार नहीं मानी।
उन्होंने अपनी तरफ से एक शर्त रखी — आप हर श्लोक तभी लिखेंगे जब उसका पूरा अर्थ समझ लेंगे।
अब दोनों की अपनी-अपनी बात थी।
गणेश जल्दी लिखना चाहते थे।
वेदव्यास को समय चाहिए था।
कहा जाता है कि जब वेदव्यास को आगे की रचना के लिए थोड़ा समय चाहिए होता, तो वे ऐसा गूढ़ श्लोक बोलते जिसे समझने में गणेश को कुछ क्षण लगते।
उन क्षणों में वेदव्यास आगे की रचना सोच लेते।
इस तरह दोनों की बुद्धि एक-दूसरे के खिलाफ नहीं गई।
बल्कि दोनों ने मिलकर काम को आगे बढ़ाया।
और यही इस कहानी की सबसे अच्छी बात है।
हम अक्सर काम करते समय सोचते हैं कि बस जल्दी करना है।
जितना जल्दी पूरा हो जाए, उतना अच्छा।
लेकिन हर काम सिर्फ गति से नहीं होता।
कुछ कामों में रुकना पड़ता है।
सोचना पड़ता है।
पूरी बात समझनी पड़ती है।
कभी सामने वाला हमसे धीमा होता है, कभी हम सामने वाले से।
कभी हमें लगता है कि दूसरा व्यक्ति हमारी गति रोक रहा है।
लेकिन हो सकता है वही रुकना काम को बेहतर बना रहा हो।
घर में भी ऐसा होता है।
आप किसी से बात कर रहे हैं और आपको लगता है कि वह आपकी बात तुरंत समझ जाए।
सामने वाला शायद उसी बात को अपने तरीके से समझ रहा होता है।
अगर दोनों सिर्फ अपनी गति पर अड़े रहें, तो बातचीत बिगड़ जाती है।
वेदव्यास और गणेश की कथा एक खूबसूरत बात कहती है — सही सहयोग में सिर्फ साथ काम करना नहीं होता, एक-दूसरे की क्षमता और सीमा को समझना भी होता है।
महाभारत · Linked wisdom: to be verse-verified — traditional account of Mahabharata's composition | Evidence: traditional | Topics: जीवन के प्रश्न, धैर्य, बुद्धि
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “सच बोलने से कभी-कभी किसी को गहरी चोट पहुंच सकती है।
ऐसे में सच बोलना सही है या चुप रहना बेहतर?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं।
सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर बड़े काम में सिर्फ मेहनत और गति काफी नहीं होती।
समझ, धैर्य और सही तालमेल भी उतना ही जरूरी है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर बड़े काम में सिर्फ मेहनत और गति काफी नहीं होती। समझ, धैर्य और सही तालमेल भी उतना ही जरूरी है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
