यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
नौकरी जाने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी कोई कीमत ही नहीं रही। क्या मेरी पहचान सिर्फ मेरे काम से जुड़ी हुई थी?
श्लोक
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5
चौपाई / दोहा
सकल पदारथ हैं जग माहीं। करमहीन नर पावत नाहीं॥
sakala padaratha hain jaga mahin, karamahina nara pavata nahin
अर्थ
संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता। हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
रत्नाकर से वाल्मीकि: जब इंसान अपने पुराने जीवन से बाहर निकलता है
रत्नाकर का जीवन ऐसा था जिसे देखकर शायद कोई भी कहेगा —
"इस आदमी के बदलने की कोई संभावना नहीं।
"
वह जंगल में यात्रियों को लूटता था।
उसका जीवन हिंसा और अपराध से भरा था।
उसका तर्क भी सीधा था —
"मैं यह अपने परिवार के लिए करता हूं।
"
एक दिन उसकी मुलाकात नारद मुनि से हुई।
रत्नाकर ने उन्हें भी रोक लिया।
लेकिन नारद डरने के बजाय शांत रहे।
उन्होंने पूछा —
"तुम यह सब किसके लिए करते हो?
"
रत्नाकर ने कहा —
"अपने परिवार के लिए।
"
नारद ने पूछा —
"क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे इन कर्मों का फल भी तुम्हारे साथ बांटेगा?
"
रत्नाकर को यह सवाल अजीब लगा।
लेकिन वह घर गया।
उसने परिवार से पूछा।
और जवाब मिला —
"हम तुम्हारे साथ पाप का फल नहीं बांटेंगे।
"
यह बात उसके लिए बहुत बड़ी चोट थी।
जिस परिवार के नाम पर वह इतना कुछ कर रहा था, वही परिवार उसके कर्मों की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था।
रत्नाकर वापस नारद के पास आया।
और पहली बार शायद उसने अपने जीवन को बाहर से देखा।
उसे समझ आया कि "मैं अपने परिवार के लिए कर रहा हूं" कह देना उसके कर्मों को सही नहीं बना देता।
नारद ने उसे राम नाम का जाप करने को कहा।
कहानी के अनुसार, वह "राम" नहीं बोल पा रहा था।
तब उसे "मरा-मरा" कहने को कहा गया।
लगातार जप करते-करते वही ध्वनि राम नाम में बदल गई।
वह वर्षों तक साधना में बैठा रहा।
उसके चारों ओर बांबी बन गई।
और जब वह बाहर निकला, तो वह वही रत्नाकर नहीं था।
परंपरा में यही व्यक्ति आगे चलकर महर्षि वाल्मीकि कहलाया।
वही वाल्मीकि जिन्हें रामायण के आदि कवि के रूप में याद किया जाता है।
मुझे इस कहानी की सबसे बड़ी बात यही लगती है —
गलत अतीत होना और हमेशा गलत बने रहना एक ही बात नहीं है।
Linked wisdom: Traditional Valmiki transformation account; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: अपराधबोध, नया आरंभ, खुद से निराश
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “नौकरी जाने के बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी कोई कीमत ही नहीं रही।
क्या मेरी पहचान सिर्फ मेरे काम से जुड़ी हुई थी?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्म से विमुख व्यक्ति उसे पा नहीं सकता।
हाथ चलेंगे तो रास्ता भी चलेगा।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — मैंने जो किया है, वह मेरा अतीत है।
लेकिन वह जरूरी नहीं कि मेरी पूरी पहचान बन जाए।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
मैंने जो किया है, वह मेरा अतीत है। लेकिन वह जरूरी नहीं कि मेरी पूरी पहचान बन जाए।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
