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मैंने हमेशा कोशिश की है कि मेरे परिवार वाले मुझसे खुश रहें और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूं। पढ़ाई, नौकरी, शादी और जीवन के फैसलों में भी मैंने कई बार अपनी इच्छा पीछे रखी है। अब कभी-कभी लगता है कि सबको खुश करते-करते मैं खुद क्या चाहता हूं, यह ही भूल गया हूं।
श्लोक
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66
चौपाई / दोहा
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥
jehi ken jehi para satya sanehu, so tehi milai na kachhu sandehu
अर्थ
जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं। सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड
कथा
भरत की खड़ाऊं: जब प्रेम में अपना स्वार्थ पीछे रह जाए
भरत जब अयोध्या लौटे और उन्हें पता चला कि राम वन भेज दिए गए हैं, तो उनके लिए यह खबर किसी जीत की तरह नहीं थी।
राज्य उनके सामने था।
लेकिन जिस व्यक्ति के लिए राज्य होना चाहिए था, वही राम वन में थे।
भरत को यह स्वीकार ही नहीं था कि राम की जगह उन्हें सिंहासन मिले।
वे राम को वापस लाने के लिए वन की ओर निकल पड़े।
जब दोनों भाई मिले, भरत ने राम से कहा कि वे अयोध्या लौट चलें।
राज्य उनका है।
अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
लेकिन राम ने मना कर दिया।
पिता का वचन था।
चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया जा चुका था।
भरत के लिए यह आसान नहीं था।
वे चाहते थे कि राम लौटें।
राम चाहते थे कि पिता का वचन पूरा हो।
दोनों के सामने अपनी-अपनी मर्यादा थी।
आखिर भरत को राम की बात स्वीकार करनी पड़ी।
लेकिन वे खाली हाथ वापस नहीं लौटे।
उन्होंने राम की पादुकाएं लीं और अयोध्या वापस आए।
सिंहासन पर स्वयं नहीं बैठे।
राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखा और स्वयं को राम का प्रतिनिधि माना।
वे नंदीग्राम में रहे और चौदह वर्षों तक राम की वापसी की प्रतीक्षा करते हुए राज्य का संचालन किया।
यह कहानी सिर्फ भाई के प्रेम की कहानी नहीं है।
यह उस प्रेम की कहानी है जिसमें सामने वाले की जगह लेने की इच्छा नहीं होती।
भरत के पास सत्ता थी, लेकिन उन्होंने उसे अपना अधिकार नहीं माना।
आज की जिंदगी में यह बात बहुत अलग तरीके से समझ आती है।
कभी किसी और की सफलता देखकर हमें लगता है—"यह जगह मेरी होनी चाहिए थी।
"
कभी किसी अपने की खुशी में भी अपना नुकसान दिखाई देने लगता है।
भरत की कहानी हमें उलटा सवाल पूछती है—
क्या मैं किसी अपने की भलाई को अपनी जीत से ऊपर रख सकता हूं?
Linked wisdom: to be verse-verified — Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Ayodhya Kand | Evidence: traditional | Topics: रिश्ते और संबंध, त्याग, प्रतीक्षा
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “मैंने हमेशा कोशिश की है कि मेरे परिवार वाले मुझसे खुश रहें और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूं।
पढ़ाई, नौकरी, शादी और जीवन के फैसलों में भी मैंने कई बार अपनी इच्छा पीछे रखी है।
अब कभी-कभी लगता है कि सबको खुश करते-करते मैं खुद क्या चाहता हूं, यह ही भूल गया हूं।
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है — इसमें संदेह नहीं।
सच्चा प्रेम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — हर रिश्ते में अपना अधिकार साबित करना जरूरी नहीं।
कभी-कभी प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही होता है कि हम किसी अपने के हिस्से की चीज़ को उसके लिए सुरक्षित रखें, भले ही हमें उसका लाभ मिल सकता हो।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
हर रिश्ते में अपना अधिकार साबित करना जरूरी नहीं। कभी-कभी प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही होता है कि हम किसी अपने के हिस्से की चीज़ को उसके लिए सुरक्षित रखें, भले ही हमें उसका लाभ मिल सकता हो।

ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “मैं जिस इंसान से सबसे ज्यादा प्यार करता हूं, उसी के साथ रहने पर मुझे सबसे ज्यादा चोट भी लगती है। कई बार सोचता हूं कि शायद मुझे इस रिश्ते के लिए थोड़ा और प्रयास करना चाहिए, लेकिन फिर लगता है कि मैं खुद को ही खोता जा रहा हूं। प्यार और अपनी आत्मसम्मान के बीच सही रास्ता कैसे समझूं?”
- “घर में मेरी शादी की बात लगातार चल रही है और परिवार को लगता है कि अब मुझे फैसला कर लेना चाहिए। मैं अपने माता-पिता की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन सच कहूं तो मैं अभी शादी के लिए मन से तैयार नहीं हूं। मैं अपनी बात कैसे समझाऊं और यह फैसला कैसे लूं?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
