← वापस

यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

कई बार लगता है कि इंसान जितनी मेहनत करता है, परिणाम उसके हाथ में नहीं होता। कोई कम प्रयास करके आगे निकल जाता है और कोई बहुत मेहनत करके भी पीछे रह जाता है। ऐसे में मैं समझ नहीं पाता कि मेरी जिंदगी मेरे कर्मों से बन रही है या पहले से तय भाग्य से। भारतीय दर्शन इसे कैसे समझाता है?

श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।

yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmyaham

श्रीमद्भगवद्गीता · 4.7

चौपाई / दोहा

कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

kadara mana kahun eka adhara, daiva daiva alasi pukara

अर्थ

कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है — भाग्य को दोष देना। साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

प्रह्लाद: जब डर सामने हो और विश्वास भीतर

प्रह्लाद बहुत छोटा था।

लेकिन जिस घर में वह बड़ा हो रहा था, वहाँ उसके विश्वास की कोई जगह नहीं थी।

उसके पिता हिरण्यकशिपु अत्यंत शक्तिशाली राजा थे।

उन्होंने कठोर तपस्या के बाद ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उन्हें साधारण तरीके से मारना लगभग असंभव था।

धीरे-धीरे शक्ति के साथ अहंकार भी बढ़ता गया।

उन्होंने अपनी प्रजा से कहा कि उनकी ही पूजा की जाए।

लेकिन उनका अपना बेटा प्रह्लाद विष्णु का भक्त था।

पहले पिता ने उसे समझाया।

फिर डराया।

फिर धमकाया।

लेकिन प्रह्लाद नहीं बदला।

कहानी के अनुसार, उसे कई तरह से नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई विष दिया गया, हाथियों के सामने डाला गया, आग में बैठाया गया, ऊंचाई से गिराया गया।

हर बार प्रह्लाद बच गया।

लेकिन इस कहानी की असली ताकत चमत्कार में नहीं है।

उस छोटे बच्चे के भीतर के उस विश्वास में है जो लगातार दबाव के बावजूद नहीं बदला।

एक दिन हिरण्यकशिपु ने गुस्से में पूछा

"तुम्हारा विष्णु कहां है?

"

प्रह्लाद ने कहा

"हर जगह।

"

हिरण्यकशिपु ने पूछा

"क्या इस खंभे में भी है?

"

प्रह्लाद ने कहा

"हां।

"

फिर खंभे पर प्रहार हुआ।

और परंपरा के अनुसार उसी क्षण नरसिंह प्रकट हुए।

दिन था, रात।

घर के भीतर, बाहर।

मनुष्य, पशु।

धरती पर, आकाश में।

हिरण्यकशिपु का अंत हुआ।

लेकिन प्रह्लाद की कहानी का अर्थ केवल यह नहीं है कि भक्त की रक्षा होती है।

इसमें एक और बात है।

जब हमारे सामने कोई बहुत शक्तिशाली व्यक्ति हो, तो डरना स्वाभाविक है।

लेकिन हर बार डर के कारण अपनी सच्चाई छोड़ देना भी जरूरी नहीं।

Linked wisdom: Srimad Bhagavatam / Vishnu Purana — Prahlada-Narasimha episode; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: आस्था, श्रद्धा, भय

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “कई बार लगता है कि इंसान जितनी मेहनत करता है, परिणाम उसके हाथ में नहीं होता।

कोई कम प्रयास करके आगे निकल जाता है और कोई बहुत मेहनत करके भी पीछे रह जाता है।

ऐसे में मैं समझ नहीं पाता कि मेरी जिंदगी मेरे कर्मों से बन रही है या पहले से तय भाग्य से।

भारतीय दर्शन इसे कैसे समझाता है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है कायर और आलसी मन का एक ही सहारा होता है भाग्य को दोष देना।

साहस कर्म से आता है, प्रतीक्षा से नहीं।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है विश्वास का मतलब यह नहीं कि जीवन में मुश्किलें नहीं आएंगी।

विश्वास का मतलब कभी-कभी सिर्फ इतना होता है कि मुश्किल आने पर भी मैं अपने भीतर की सही बात को पूरी तरह छोड़ नहीं देता।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

विश्वास का मतलब यह नहीं कि जीवन में मुश्किलें नहीं आएंगी। विश्वास का मतलब कभी-कभी सिर्फ इतना होता है कि मुश्किल आने पर भी मैं अपने भीतर की सही बात को पूरी तरह छोड़ नहीं देता।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक