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गायत्री जप

गायत्री से संबंधित · नित्य जप

अन्य नाम: गायत्री साधना, संध्या जप

यह पूजा क्या है?

गायत्री मंत्र का नियमित जप, जो प्रातः सूर्योदय, मध्याह्न और सूर्यास्त की संध्या-वेला में किया जाता है।

किसकी पूजा है?

गायत्रीसूर्य

इसे क्यों करते हैं?

गायत्री को बुद्धि को सन्मार्ग देने वाली प्रार्थना कहा गया है। यह जप मन की मलिनता हटाकर विवेक जगाने के लिए किया जाता है।

इसे करने से क्या फल मिलता है?

मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता; क्रोध और चंचलता में कमी; आत्मविश्वास और तेज की वृद्धि; निर्णय लेने में स्थिरता।

कब की जाती है?

प्रातः सूर्योदय के समय सर्वश्रेष्ठ; संध्या भी उपयुक्त।

कौन कर सकता है?

कोई भी स्त्री-पुरुष कर सकता है।

क्या कोई विशेष नियम हैं?

जप माला से करें और संख्या निश्चित रखें (कम से कम 108)। जप के समय आसन स्थिर रखें और पूर्व दिशा की ओर मुख करें।

कब नहीं करनी चाहिए?

अशौच काल में मानसिक जप करें, उच्च स्वर में नहीं।

कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम

  1. 1. प्रातः स्नान कर पूर्व दिशा की ओर आसन पर बैठें
  2. 2. सूर्य को जल से अर्घ्य दें
  3. 3. "ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" का जप करें
  4. 4. कम से कम 108 बार माला से जप करें
  5. 5. जप के बाद पाँच मिनट मौन बैठें
  6. 6. जल या अन्न का दान करें

विस्तृत विधि

गायत्री जप का फल संख्या से नहीं, स्थिरता से आता है। परंपरा में कहा गया है कि प्रतिदिन एक ही समय, एक ही स्थान और एक ही आसन पर जप करने से मन स्वयं उसी समय शांत होने लगता है। आरंभ में 108 जप पर्याप्त हैं; अभ्यास बढ़ने पर संख्या बढ़ाई जा सकती है। जप के पश्चात का मौन ही वास्तविक साधना मानी गई है।

पूजा सामग्री — पूरी सूची

नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।

  • 1.रुद्राक्ष या तुलसी माला
  • 2.तांबे का लोटा
  • 3.जल
  • 4.आसन
  • 5.दीपक

सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

कितने समय की15–20 मिनट
घर या मंदिरघर या नदी तट
पुरोहित आवश्यक?आवश्यक नहीं

क्षेत्रीय अंतर

आर्य समाज और गायत्री परिवार में विशेष रूप से प्रचारित; सर्वत्र मान्य।

पारंपरिक महत्व

गायत्री को वेदमाता कहा गया है — यह किसी वस्तु की नहीं, सद्बुद्धि की प्रार्थना है।

परंपरा और संदर्भ

परंपरा: सनातन

क्षेत्र: भारत

संदर्भ: ऋग्वेद 3.62.10

विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

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