पारंपरिक कलश← पूजा और संस्कार

नवग्रह शांति

नवग्रह से संबंधित · ग्रह संबंधी · शांति अनुष्ठान

अन्य नाम: ग्रह शांति, नवग्रह पूजा

यह पूजा क्या है?

नवग्रह शांति में नौ ग्रहों से संबंधित मंत्र, हवन और दान की परंपरा है। यह प्रायः किसी बड़े अनुष्ठान के अंग के रूप में भी किया जाता है। इसका केंद्र नवग्रह हैं, और पूरी प्रक्रिया उन्हीं के आवाहन, पूजन और विदाई के क्रम में चलती है। परंपरा में इसे मुख्यतः शांति, जीवन परिस्थिति जैसे अवसरों से जोड़ा गया है। यह कोई कठिन या खर्चीला अनुष्ठान नहीं है — इसे सामान्य घर में, उपलब्ध सामग्री से और सीमित समय में भी उतनी ही श्रद्धा से किया जा सकता है। शास्त्रों और लोक-परंपरा दोनों में बार-बार यही कहा गया है कि सामग्री की भव्यता नहीं, भाव की शुद्धता ही मुख्य है।

किसकी पूजा है?

नवग्रह

इसे क्यों करते हैं?

परंपरा में इसे जीवन की कठिन अवधि में मानसिक स्थिरता और शुभ भाव के लिए किया जाता है। इसके पीछे भाव यह है कि जीवन में जो कुछ मिला है उसके लिए कृतज्ञता प्रकट की जाए और जो आगे करना है उसके लिए मन को स्थिर किया जाए। नवग्रह के समक्ष बैठकर व्यक्ति अपनी चिंता, अपनी इच्छा और अपना संकल्प स्पष्ट शब्दों में रखता है — और यही स्पष्टता उसे भीतर से हल्का करती है। दूसरा कारण सामाजिक है: यह अनुष्ठान परिवार को एक स्थान पर बैठाता है, बच्चों तक परंपरा पहुँचाता है और पड़ोस-समाज से जुड़ाव बनाए रखता है। तीसरा कारण अनुशासन का है — नियत समय, नियत क्रम और नियत संयम व्यक्ति के दिन को एक ठहराव देते हैं।

इसे करने से क्या फल मिलता है?

नवग्रह शांति करने से क्या फल मिलता है — इसका उत्तर परंपरा दो स्तरों पर देती है। पहला स्तर भीतर का है: नवग्रह के समक्ष बैठकर, संकल्प लेकर और पूरी विधि धैर्य से करने पर मन का बिखराव कम होता है, क्रोध और जल्दबाज़ी घटती है, और निर्णय लेने में स्थिरता आती है। दूसरा स्तर बाहर का है: इसका फल परंपरा में ग्रह-पीड़ा और मानसिक बेचैनी में कमी, तथा कठिन समय में धैर्य बनाए रखने की शक्ति के रूप में बताया गया है। इसके अतिरिक्त परिवार में परस्पर सहयोग बढ़ता है, घर का वातावरण सकारात्मक रहता है, बच्चों में संस्कार और बड़ों के प्रति आदर का भाव विकसित होता है, तथा दान और प्रसाद-वितरण से आसपास के लोगों तक भी उस शुभ का हिस्सा पहुँचता है। परंपरा यह भी स्पष्ट कहती है कि फल का अर्थ कोई तात्कालिक चमत्कार नहीं है। फल क्रमशः आता है — पहले भाव बदलता है, फिर व्यवहार, और तब परिस्थिति। इसीलिए कहा गया है कि पूजा का सबसे बड़ा फल स्वयं पूजा करने वाले का बदला हुआ मन है।

कब की जाती है?

ज्योतिषीय परामर्श के अनुसार, या गृह प्रवेश एवं विवाह जैसे अनुष्ठानों के साथ।

कौन कर सकता है?

परिवार का सदस्य संकल्प लेकर।

क्या कोई विशेष नियम हैं?

दान और सेवा इसका महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।

कब नहीं करनी चाहिए?

किसी भी प्रकार के भय-आधारित या अत्यधिक व्यय वाले उपायों से बचें।

कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम

  1. 1. संकल्प
  2. 2. गणेश पूजन
  3. 3. नवग्रह मंडल स्थापना
  4. 4. ग्रह मंत्र जाप
  5. 5. हवन
  6. 6. दान

विस्तृत विधि

नवग्रह शांति की विधि को परंपरा में जल्दबाज़ी का काम नहीं माना गया। पूरी प्रक्रिया एक क्रम में चलती है, और हर चरण का अपना भाव है। सबसे पहले संकल्प लिया जाता है — हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर मन ही मन यह कहा जाता है कि यह पूजा किस उद्देश्य से, किसके निमित्त और किस भाव से की जा रही है; परंपरा में यही संकल्प पूरी पूजा की नींव माना गया है। इसके बाद श्री गणेश का पूजन होता है — रोली, अक्षत, दूर्वा और मोदक अर्पित कर किसी भी शुभ कार्य के निर्विघ्न पूर्ण होने की प्रार्थना की जाती है। फिर नवग्रह मंडल स्थापना किया जाता है। तत्पश्चात ग्रह मंत्र जाप किया जाता है। आगे हवन किया जाता है — अग्नि प्रज्वलित कर घी, हवन-सामग्री और आहुतियाँ मंत्रोच्चार के साथ अर्पित की जाती हैं और अंत में पूर्णाहुति दी जाती है। अंत में सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या द्रव्य का दान किया जाता है — परंपरा में दान के बिना अनुष्ठान अधूरा माना गया है। पूरी विधि में मंत्रों का शुद्ध उच्चारण उतना आवश्यक नहीं माना गया जितना भाव की सच्चाई — परंपरा कहती है कि जो मन से किया जाए, वही पूर्ण है। क्षेत्र, परिवार और कुल-परंपरा के अनुसार चरणों का क्रम थोड़ा अलग हो सकता है; ऐसे में घर के बड़ों या कुल-पुरोहित की बताई विधि ही मान्य होती है।

पूजा सामग्री — पूरी सूची

नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।

  • 1.स्वच्छ चौकी या आसन
  • 2.लाल या पीला वस्त्र
  • 3.शुद्ध जल और गंगाजल
  • 4.कलश (तांबा या मिट्टी)
  • 5.आम के पत्ते
  • 6.नारियल
  • 7.अक्षत (साबुत चावल)
  • 8.रोली और कुमकुम
  • 9.हल्दी
  • 10.चंदन
  • 11.पुष्प और पुष्पमाला
  • 12.दूर्वा
  • 13.धूप या अगरबत्ती
  • 14.घी का दीपक और रुई की बाती
  • 15.कपूर
  • 16.माचिस
  • 17.पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • 18.मौली या कलावा
  • 19.सुपारी और पान के पत्ते
  • 20.इलायची और लौंग
  • 21.मिष्ठान्न
  • 22.ऋतु-फल
  • 23.तुलसी दल
  • 24.आरती की थाली
  • 25.घंटी और शंख
  • 26.जल का लोटा और आचमनी
  • 27.दक्षिणा हेतु सिक्के
  • 28.प्रसाद हेतु पात्र
  • 29.कूड़ा एवं निर्माल्य रखने का पात्र
  • 30.हवन सामग्री
  • 31.काले तिल
  • 32.जौ
  • 33.दान हेतु अन्न और वस्त्र
  • 34.नवग्रह समिधा
  • 35.नौ प्रकार के अनाज
  • 36.वस्त्र
  • 37.दीप
  • 38.कलश

सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

कितने समय की2 से 4 घंटे
घर या मंदिरघर या मंदिर
पुरोहित आवश्यक?विस्तृत विधि के लिए आचार्य की सहायता ली जाती है।

क्षेत्रीय अंतर

दक्षिण भारत में नवग्रह मंदिर परिक्रमा की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।

पारंपरिक महत्व

जीवन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करने का भाव।

परंपरा और संदर्भ

परंपरा: वैदिक परंपरा · ज्योतिष परंपरा

क्षेत्र: उत्तर भारत · दक्षिण भारत

संदर्भ: ज्योतिष एवं वैदिक हवन परंपरा

विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

शायद आप यह भी देखना चाहें

आपके अनुभव और प्रश्न

इस पूजा से जुड़ा अपना अनुभव या जिज्ञासा यहाँ साझा करें। नाम देना आवश्यक नहीं है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

← पूजा और संस्कार