पारंपरिक कलश← पूजा और संस्कार

सुंदरकांड पाठ

हनुमान से संबंधित · नित्य पाठ

अन्य नाम: सुन्दरकाण्ड पारायण

यह पूजा क्या है?

रामचरितमानस के पंचम सोपान सुंदरकांड का सस्वर पाठ, जो प्रायः मंगलवार, शनिवार या सामूहिक रूप से किया जाता है।

किसकी पूजा है?

हनुमानराम

इसे क्यों करते हैं?

सुंदरकांड वह प्रसंग है जिसमें हनुमान असंभव को संभव करते हैं। यह पाठ साधक के भीतर वही विश्वास जगाने के लिए किया जाता है कि बाधा चाहे समुद्र जितनी हो, संकल्प से पार होती है।

इसे करने से क्या फल मिलता है?

रुके हुए कार्य में गति; भय और निराशा का शमन; परिवार में एकता; यात्रा और नए प्रयास में शुभता की मान्यता।

कब की जाती है?

मंगलवार, शनिवार, या किसी बड़े कार्य के आरंभ से पूर्व। संध्या समय श्रेष्ठ।

कौन कर सकता है?

कोई भी व्यक्ति; परिवार सहित सामूहिक पाठ अधिक फलदायी माना जाता है।

क्या कोई विशेष नियम हैं?

पाठ बीच में न रोकें; एक बैठक में पूर्ण करें। पाठ के पूर्व राम-सीता और हनुमान का ध्यान करें।

कब नहीं करनी चाहिए?

अशौच काल में सामूहिक पाठ स्थगित कर दें।

कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम

  1. 1. स्नान कर स्वच्छ स्थान पर आसन लगाएँ
  2. 2. राम दरबार और हनुमान जी के चित्र के समक्ष दीपक जलाएँ
  3. 3. संकल्प लें कि किस उद्देश्य से पाठ कर रहे हैं
  4. 4. सुंदरकांड का सस्वर पूर्ण पाठ करें
  5. 5. अंत में आरती और हनुमान जी को बूंदी या गुड़ का भोग लगाएँ
  6. 6. प्रसाद वितरण करें

विस्तृत विधि

सुंदरकांड का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, एक यात्रा है — संदेह से संकल्प तक। परंपरा में कहा गया है कि जिस घर में सुंदरकांड नियमित होता है वहाँ निराशा नहीं ठहरती। जिन्हें एक बैठक कठिन लगे वे इसे पाँच दिनों में विभाजित कर सकते हैं, किंतु प्रतिदिन उसी समय पर पाठ करें। बड़े संकट में इकतालीस दिन का पारायण संकल्प लिया जाता है।

पूजा सामग्री — पूरी सूची

नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।

  • 1.रामचरितमानस या सुंदरकांड पुस्तिका
  • 2.दीपक और घी
  • 3.सिंदूर
  • 4.लाल पुष्प
  • 5.बूंदी या गुड़
  • 6.आसन

सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

कितने समय की1.5–2 घंटे
घर या मंदिरघर या मंदिर
पुरोहित आवश्यक?आवश्यक नहीं; सामूहिक पाठ में व्यास उपयोगी

क्षेत्रीय अंतर

उत्तर भारत में सामूहिक सुंदरकांड मंडली की परंपरा व्यापक है।

पारंपरिक महत्व

सुंदरकांड को मानस का एकमात्र ऐसा कांड कहा गया है जिसमें आरंभ से अंत तक विजय का भाव है।

परंपरा और संदर्भ

परंपरा: सनातन

क्षेत्र: भारत

संदर्भ: श्रीरामचरितमानस — तुलसीदास

विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

शायद आप यह भी देखना चाहें

कलश — शुभता का प्रतीक

आपके अनुभव और प्रश्न

इस पूजा से जुड़ा अपना अनुभव या जिज्ञासा यहाँ साझा करें। नाम देना आवश्यक नहीं है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

← पूजा और संस्कार