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तुलसी से संबंधित · नित्य पूजा
अन्य नाम: तुलसी सेवा, तुलसी दीपदान
यह पूजा क्या है?
तुलसी के पौधे की नित्य सेवा — जल अर्पण, प्रदक्षिणा और संध्या दीपदान।
किसकी पूजा है?
इसे क्यों करते हैं?
तुलsी को घर की शुद्धि और विष्णु-प्रियता का प्रतीक माना गया है। यह नित्य सेवा घर के वातावरण और मन दोनों को शांत रखने के लिए की जाती है।
इसे करने से क्या फल मिलता है?
घर के वातावरण में शांति; दैनिक अनुशासन का अभ्यास; स्वास्थ्य लाभ की मान्यता; परिवार में साथ बैठने का अवसर।
कब की जाती है?
प्रतिदिन — प्रातः जल अर्पण और संध्या को दीपदान।
कौन कर सकता है?
घर का कोई भी सदस्य; प्रायः गृहिणी करती हैं किंतु कोई बंधन नहीं।
क्या कोई विशेष नियम हैं?
रविवार और एकादशी को तुलसी दल न तोड़ें। संध्या के बाद जल न चढ़ाएँ — यह पारंपरिक नियम है।
कब नहीं करनी चाहिए?
अशौच काल में स्पर्श से बचें, दूर से दीपक दिखा सकते हैं।
कैसे की जाती है? — संक्षिप्त क्रम
- 1. प्रातः स्नान कर तुलसी को जल अर्पित करें
- 2. तुलसी के समक्ष हाथ जोड़कर तीन प्रदक्षिणा करें
- 3. संध्या समय घी या तेल का दीपक जलाएँ
- 4. "ॐ तुलस्यै नमः" का जप करें
- 5. सप्ताह में एक दिन परिवार सहित तुलसी आरती करें
- 6. तुलसी दल विष्णु या कृष्ण को अर्पित करें
विस्तृत विधि
तुलसी सेवा की शक्ति उसकी सरलता में है — इसमें न सामग्री चाहिए, न पुरोहित, न लंबा समय। परंपरा कहती है कि संध्या का तुलसी दीप घर की क्लेश-निवृत्ति का सबसे सरल उपाय है। जिन घरों में तनाव अधिक हो, वहाँ परिवार के सभी सदस्य मिलकर संध्या दीप जलाएँ और दो मिनट मौन खड़े रहें — यही छोटा-सा क्रम कई घरों में संवाद लौटा देता है।
पूजा सामग्री — पूरी सूची
नीचे दी गई सूची में सामान्य पूजन सामग्री और इस पूजा से जुड़ी विशेष सामग्री — दोनों सम्मिलित हैं। जो वस्तु उपलब्ध न हो, उसके स्थान पर जल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य है।
- 1.तुलसी का पौधा
- 2.जल
- 3.घी या तिल का तेल
- 4.दीपक
- 5.लाल चुनरी (वैकल्पिक)
- 6.धूप
सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
क्षेत्रीय अंतर
महाराष्ट्र में तुलसी विवाह की विशेष परंपरा; उत्तर भारत में कार्तिक मास में विशेष दीपदान।
पारंपरिक महत्व
तुलसी वह देवता है जो द्वार पर खड़ा रहता है — प्रतिदिन का छोटा नमन ही उसकी पूजा है।
परंपरा और संदर्भ
परंपरा: सनातन
क्षेत्र: भारत
संदर्भ: पद्म पुराण · स्कंद पुराण
विधि और सामग्री क्षेत्र, परिवार और परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। यहाँ दी गई जानकारी सामान्य पारंपरिक ढाँचा है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।
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आपके अनुभव और प्रश्न
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