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यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

काम का इतना बोझ है कि दिमाग ऑफिस से घर आने के बाद भी बंद नहीं होता। बिस्तर पर लेटता हूँ तो अगले दिन के काम याद आने लगते हैं और नींद भी ठीक से नहीं आती। मैं इस लगातार तनाव को कैसे संभालूँ?

श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।5।।

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 6.5

चौपाई / दोहा

मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

Mangal bhavan amangal hari, dravau so Dasarath ajir bihari

अर्थ

जो मंगल के धाम और अमंगल के नाशक हैं, वे कृपा करें — अशुभ के भय में यह पंक्ति आश्रय देती है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

अर्जुन की आंख: जब दुनिया का शोर पीछे छूट जाए

गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे।

एक दिन उन्होंने सबकी परीक्षा लेने का फैसला किया।

पेड़ की एक डाल पर लकड़ी की चिड़िया रखी गई।

निशाना था उसकी आंख।

द्रोणाचार्य ने एक-एक करके अपने शिष्यों को बुलाया।

उन्होंने पूछा "तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?

"

किसी ने कहा पेड़।

किसी ने कहा डाल।

किसी ने कहा चिड़िया।

किसी ने कहा आकाश भी दिखाई दे रहा है।

सबकी नजर एक साथ कई चीज़ों पर थी।

फिर अर्जुन की बारी आई।

द्रोणाचार्य ने वही सवाल पूछा।

अर्जुन ने कहा "मुझे सिर्फ चिड़िया की आंख दिखाई दे रही है।

"

द्रोणाचार्य ने फिर पूछा "तुम्हें पेड़ दिखाई नहीं दे रहा?

"

अर्जुन ने कहा "नहीं।

"

"डाल?

"

"नहीं।

"

"आकाश?

"

"नहीं।

"

"तो क्या दिखाई दे रहा है?

"

"सिर्फ चिड़िया की आंख।

"

और फिर उन्हें निशाना लगाने की अनुमति मिली।

अर्जुन का बाण सीधा लक्ष्य पर लगा।

यह कहानी बचपन से सुनाई जाती रही है, लेकिन शायद इसकी जरूरत हमें बड़े होने के बाद ज्यादा पड़ती है।

क्योंकि आज हमारे सामने चिड़िया की आंख एक नहीं, सौ हैं।

मोबाइल में एक संदेश।

फिर कोई फोन।

फिर सोशल मीडिया।

फिर घर का काम।

फिर ऑफिस की चिंता।

फिर यह कि दूसरे लोग क्या कर रहे हैं।

फिर यह कि मेरा काम अभी तक पूरा क्यों नहीं हुआ।

हम बैठे एक काम करने के लिए हैं, लेकिन दिमाग दस जगह घूम रहा है।

और शाम को लगता है आज पूरा दिन व्यस्त रहा, फिर भी किया क्या?

यहीं अर्जुन की कहानी फिर से काम आती है।

एकाग्रता का मतलब यह नहीं कि दुनिया में बाकी कुछ है ही नहीं।

मतलब सिर्फ इतना है कि जब कोई जरूरी काम सामने हो, तब कुछ समय के लिए बाकी शोर को पीछे किया जा सके।

हमेशा आसान नहीं होता।

कभी परिवार की चिंता सच में जरूरी होती है।

कभी पैसे की परेशानी सच में सामने होती है।

कभी मन इतना उलझा होता है कि एक जगह टिकना मुश्किल लगता है।

लेकिन ऐसे समय में भी हम अपने सामने एक छोटी-सी "चिड़िया की आंख" चुन सकते हैं।

पूरी जिंदगी नहीं।

सिर्फ अगला काम।

महाभारत · Linked wisdom: to be verse-verified — Mahabharata, Adi Parva | Evidence: traditional | Topics: ध्यान नहीं लगता, एकाग्रता, तरक्की नहीं हो रही

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “काम का इतना बोझ है कि दिमाग ऑफिस से घर आने के बाद भी बंद नहीं होता।

बिस्तर पर लेटता हूँ तो अगले दिन के काम याद आने लगते हैं और नींद भी ठीक से नहीं आती।

मैं इस लगातार तनाव को कैसे संभालूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो मंगल के धाम और अमंगल के नाशक हैं, वे कृपा करें अशुभ के भय में यह पंक्ति आश्रय देती है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है एकाग्रता का मतलब सब समस्याएं खत्म होना नहीं है।

इसका मतलब है जो अभी मेरे सामने सबसे जरूरी है, उस पर कुछ समय पूरी तरह टिक जाना।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

एकाग्रता का मतलब सब समस्याएं खत्म होना नहीं है। इसका मतलब है — जो अभी मेरे सामने सबसे जरूरी है, उस पर कुछ समय पूरी तरह टिक जाना।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक