← वापस

यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है

घर की जिम्मेदारियां अलग हैं और बाहर की जिम्मेदारियां अलग। हर किसी को लगता है कि मैं सब संभाल लूंगा, लेकिन सच यह है कि अंदर से बहुत थक चुका हूँ। कभी-कभी लगता है कि बस सब छोड़कर कहीं चला जाऊँ। इस स्थिति को कैसे संभालूँ?

श्लोक

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।20।।

aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ aham ādiśh cha madhyaṁ cha bhūtānām anta eva cha

श्रीमद्भगवद्गीता · 10.20

चौपाई / दोहा

मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

Mangal bhavan amangal hari, dravau so Dasarath ajir bihari

अर्थ

जो मंगल के धाम और अमंगल के नाशक हैं, वे कृपा करें — अशुभ के भय में यह पंक्ति आश्रय देती है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

भरत की खड़ाऊं: जब प्रेम में अपना स्वार्थ पीछे रह जाए

भरत जब अयोध्या लौटे और उन्हें पता चला कि राम वन भेज दिए गए हैं, तो उनके लिए यह खबर किसी जीत की तरह नहीं थी।

राज्य उनके सामने था।

लेकिन जिस व्यक्ति के लिए राज्य होना चाहिए था, वही राम वन में थे।

भरत को यह स्वीकार ही नहीं था कि राम की जगह उन्हें सिंहासन मिले।

वे राम को वापस लाने के लिए वन की ओर निकल पड़े।

जब दोनों भाई मिले, भरत ने राम से कहा कि वे अयोध्या लौट चलें।

राज्य उनका है।

अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही है।

लेकिन राम ने मना कर दिया।

पिता का वचन था।

चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया जा चुका था।

भरत के लिए यह आसान नहीं था।

वे चाहते थे कि राम लौटें।

राम चाहते थे कि पिता का वचन पूरा हो।

दोनों के सामने अपनी-अपनी मर्यादा थी।

आखिर भरत को राम की बात स्वीकार करनी पड़ी।

लेकिन वे खाली हाथ वापस नहीं लौटे।

उन्होंने राम की पादुकाएं लीं और अयोध्या वापस आए।

सिंहासन पर स्वयं नहीं बैठे।

राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखा और स्वयं को राम का प्रतिनिधि माना।

वे नंदीग्राम में रहे और चौदह वर्षों तक राम की वापसी की प्रतीक्षा करते हुए राज्य का संचालन किया।

यह कहानी सिर्फ भाई के प्रेम की कहानी नहीं है।

यह उस प्रेम की कहानी है जिसमें सामने वाले की जगह लेने की इच्छा नहीं होती।

भरत के पास सत्ता थी, लेकिन उन्होंने उसे अपना अधिकार नहीं माना।

आज की जिंदगी में यह बात बहुत अलग तरीके से समझ आती है।

कभी किसी और की सफलता देखकर हमें लगता है—"यह जगह मेरी होनी चाहिए थी।

"

कभी किसी अपने की खुशी में भी अपना नुकसान दिखाई देने लगता है।

भरत की कहानी हमें उलटा सवाल पूछती है—

क्या मैं किसी अपने की भलाई को अपनी जीत से ऊपर रख सकता हूं?

Linked wisdom: to be verse-verified — Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Ayodhya Kand | Evidence: traditional | Topics: रिश्ते और संबंध, त्याग, प्रतीक्षा

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “घर की जिम्मेदारियां अलग हैं और बाहर की जिम्मेदारियां अलग।

हर किसी को लगता है कि मैं सब संभाल लूंगा, लेकिन सच यह है कि अंदर से बहुत थक चुका हूँ।

कभी-कभी लगता है कि बस सब छोड़कर कहीं चला जाऊँ।

इस स्थिति को कैसे संभालूँ?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जो मंगल के धाम और अमंगल के नाशक हैं, वे कृपा करें अशुभ के भय में यह पंक्ति आश्रय देती है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर रिश्ते में अपना अधिकार साबित करना जरूरी नहीं।

कभी-कभी प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही होता है कि हम किसी अपने के हिस्से की चीज़ को उसके लिए सुरक्षित रखें, भले ही हमें उसका लाभ मिल सकता हो।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर रिश्ते में अपना अधिकार साबित करना जरूरी नहीं। कभी-कभी प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही होता है कि हम किसी अपने के हिस्से की चीज़ को उसके लिए सुरक्षित रखें, भले ही हमें उसका लाभ मिल सकता हो।

कलश — शुभता का प्रतीक

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक