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मुझे छोटी-छोटी बातों पर इतना गुस्सा आने लगा है कि उस समय मैं ऐसी बातें कह देता हूँ जिनका बाद में खुद पछतावा होता है। कई बार पहले से पता होता है कि मेरी प्रतिक्रिया ज्यादा है, फिर भी मैं खुद को रोक नहीं पाता। क्यों?

श्लोक

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।

krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63

चौपाई / दोहा

परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

parahita sarisa dharama nahin bhai, para pira sama nahin adhamai

अर्थ

दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं। मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

सती: जब अपमान का दर्द भीतर सब कुछ जला दे

सती का जीवन एक ऐसे मोड़ पर पहुंचा जहां दुख सिर्फ दुख नहीं रहा था—वह अपमान, क्रोध और असहनीय पीड़ा में बदल गया था।

सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं और उन्होंने भगवान शिव से विवाह किया था।

दक्ष इस विवाह से प्रसन्न नहीं थे और शिव के प्रति उनके मन में सम्मान नहीं था।

एक बड़े यज्ञ का आयोजन हुआ।

शिव को आमंत्रित नहीं किया गया।

सती को यह बात पता चली तो वे अपने पिता के घर चली गईं।

उनके मन में शायद यह उम्मीद थी कि पिता के घर जाने पर सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन वहां उन्होंने अपने पति के प्रति अपमानजनक बातें सुनीं।

जिस व्यक्ति को वे अपना जीवनसाथी मानती थीं, उसका अपमान उनके सामने हो रहा था।

सती के लिए यह सिर्फ किसी व्यक्ति का अपमान नहीं था।

यह उनके अपने निर्णय, अपने प्रेम और अपने जीवन का अपमान जैसा था।

उनका मन उस पीड़ा को सह नहीं पाया।

कथा के अनुसार, उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना शरीर त्याग दिया।

जब यह समाचार शिव तक पहुंचा, तो उनका दुःख और क्रोध इतना गहरा था कि उससे आगे एक भयंकर विनाशकारी क्रम शुरू हुआ।

वीरभद्र का प्रकट होना और दक्ष के यज्ञ का नष्ट होना इसी प्रसंग का हिस्सा है।

लेकिन सती और शिव की कथा केवल विनाश पर समाप्त नहीं होती।

आगे चलकर सती पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेती हैं और शिव-पार्वती का पुनर्मिलन होता है।

यहीं यह कहानी एक दूसरी दिशा लेती है।

हमारे जीवन में भी कभी ऐसा होता है कि कोई बात हमें इतनी चोट पहुंचाती है कि लगता है अब कुछ पहले जैसा नहीं रहेगा।

किसी अपने का अपमान।

किसी रिश्ते का टूटना।

किसी प्रिय व्यक्ति को खो देना।

कभी-कभी हम दुखी होते हैं और हमें पता भी नहीं चलता कि वह दुख कब क्रोध बन गया।

इसलिए इस कथा को सिर्फ क्रोध की कहानी की तरह नहीं, बल्कि दुख की गहराई को समझने वाली कहानी की तरह भी पढ़ा जा सकता है।

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स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मुझे छोटी-छोटी बातों पर इतना गुस्सा आने लगा है कि उस समय मैं ऐसी बातें कह देता हूँ जिनका बाद में खुद पछतावा होता है।

कई बार पहले से पता होता है कि मेरी प्रतिक्रिया ज्यादा है, फिर भी मैं खुद को रोक नहीं पाता।

क्यों?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।

मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है दुख को दबाते रहना भी ठीक नहीं और उसे ऐसा क्रोध बना देना भी ठीक नहीं जो हमें ही जला दे।

दुख को पहचानना, उसे स्वीकार करना और उसके साथ सही तरीके से जीना भी एक साधना है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

दुख को दबाते रहना भी ठीक नहीं और उसे ऐसा क्रोध बना देना भी ठीक नहीं जो हमें ही जला दे। दुख को पहचानना, उसे स्वीकार करना और उसके साथ सही तरीके से जीना भी एक साधना है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक