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जब कोई मेरी बात नहीं मानता या मुझे गलत समझता है तो अंदर से बहुत गुस्सा आता है। उस समय लगता है कि सामने वाले को किसी भी तरह समझाना जरूरी है। मेरे गुस्से के पीछे आखिर इतना बेचैन होने का कारण क्या है?

श्लोक

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।63।।

krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.63

चौपाई / दोहा

परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

parahita sarisa dharama nahin bhai, para pira sama nahin adhamai

अर्थ

दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं। मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

हनुमान की पूंछ में आग: जब अपमान को उद्देश्य में बदल दिया जाए

लंका में हनुमान को पकड़कर रावण के दरबार में लाया गया।

हनुमान अकेले थे।

वे किसी सेना के साथ नहीं आए थे।

वे सीता की खोज में समुद्र पार करके पहुंचे थे और अब रावण के सामने खड़े थे।

रावण ने उन्हें देखा और उनके साथ कठोर व्यवहार किया।

आखिर में उन्हें अपमानित करने के लिए उनकी पूंछ में कपड़े लपेटकर आग लगाने का आदेश दिया गया।

लंका के लोग इकट्ठा हुए।

कपड़ा लपेटा गया।

आग लगा दी गई।

सोचिए, उस समय हनुमान के मन में कितना क्रोध आया होगा।

लेकिन कहानी का दिल यहीं है।

उन्होंने उस क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।

उन्होंने परिस्थिति को देखा और फिर उसी आग को अपने उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर लिया।

जलती हुई पूंछ के साथ वे लंका के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जाने लगे।

आग फैलती गई और देखते-देखते लंका का बड़ा हिस्सा जलने लगा।

जिस चीज़ को रावण ने हनुमान का अपमान करने के लिए इस्तेमाल किया था, वही उसके लिए संकट बन गई।

लेकिन इस कहानी को सिर्फ "क्रोध से सब जला दो" की तरह समझना ठीक नहीं होगा।

हनुमान का उद्देश्य व्यक्तिगत बदला लेना नहीं था।

वे सीता की खोज और राम के कार्य के लिए लंका आए थे।

उनका पूरा काम उसी उद्देश्य से जुड़ा था।

हमारे जीवन में भी अपमान होता है।

किसी ने ऑफिस में सबके सामने कुछ कह दिया।

किसी रिश्तेदार ने ऐसी बात बोल दी जिसे हम भूल नहीं पाए।

किसी दोस्त ने हमारी मेहनत का मजाक बना दिया।

कभी-कभी हम उस एक बात को लेकर घंटों सोचते रहते हैं।

"उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?

"

"मैं उसे जवाब क्यों नहीं दे पाया?

"

"अब मैं उसे दिखाऊंगा।

"

यहीं से गुस्सा हमें चलाने लगता है।

हनुमान की कथा एक दूसरी दिशा दिखाती है।

गुस्सा आया ठीक है।

लेकिन अगला सवाल यह होना चाहिए अब मैं इस ऊर्जा का क्या करूं?

अगर वही ऊर्जा हमें किसी सही काम की ओर ले जाए, तो परिस्थिति बदल सकती है।

अगर वही ऊर्जा हमें सिर्फ बदला लेने में लगा दे, तो हम खुद भी उसी आग में जलने लगते हैं।

Linked wisdom: to be verse-verified — Valmiki Ramayana / Ramcharitmanas, Sundara Kand | Evidence: traditional | Topics: क्रोध, न्याय, साहस

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “जब कोई मेरी बात नहीं मानता या मुझे गलत समझता है तो अंदर से बहुत गुस्सा आता है।

उस समय लगता है कि सामने वाले को किसी भी तरह समझाना जरूरी है।

मेरे गुस्से के पीछे आखिर इतना बेचैन होने का कारण क्या है?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है दूसरों के हित जैसा कोई धर्म नहीं, और दूसरों को पीड़ा देने जैसा कोई नीच कर्म नहीं।

मन जब भारी हो, किसी और का भार हल्का कीजिए।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है गुस्सा आना अपने आप में गलत नहीं है।

लेकिन गुस्सा मेरे अगले कदम को तय करे, यह जरूरी नहीं।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

गुस्सा आना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन गुस्सा मेरे अगले कदम को तय करे, यह जरूरी नहीं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक