यह अनुभव किसी साथी द्वारा साझा किया गया है · नाम: छिपाया गया है
क्या ईर्ष्या को सिर्फ बुरी भावना मानकर दबा देना चाहिए? अगर किसी दूसरे की सफलता देखकर मुझे लगता है कि मैं भी अपने जीवन में कुछ करना चाहता हूँ, तो क्या इस भावना को अपने लिए सकारात्मक दिशा में इस्तेमाल किया जा सकता है?
श्लोक
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66
चौपाई / दोहा
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥
Samarath kahun nahin doshu gosain, rabi pavak Surasari ki nain
अर्थ
समर्थ को दोष नहीं लगता, जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा — किंतु यही सोच अहंकार बन जाए तो पतन निश्चित है।
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड
कथा
हर हृदय में बैठा हुआ
गीता के दसवें अध्याय में अर्जुन कृष्ण से उनके वास्तविक स्वरूप के बारे में सुन रहे हैं।
कृष्ण उन्हें बताते हैं कि संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ, सुंदर और प्रभावशाली है, उसमें उनकी एक झलक देखी जा सकती है।
और फिर एक बहुत व्यक्तिगत बात कहते हैं—
“अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
”
मैं, हे अर्जुन, सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।
फिर कृष्ण कहते हैं—
“अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।
”
मैं ही सभी प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।
यह बात अर्जुन के लिए शायद इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि वे कृष्ण को अपने सारथी के रूप में जानते थे।
लेकिन कृष्ण उन्हें अपने उस रूप की ओर देखने को कह रहे थे जो सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है।
हम भी कई बार ईश्वर या किसी बड़ी आध्यात्मिक सच्चाई को अपने से बहुत दूर समझते हैं।
मंदिर में।
किसी तीर्थ में।
किसी किताब में।
किसी दूसरे व्यक्ति के अनुभव में।
लेकिन गीता का यह विचार खोज की दिशा बदल देता है।
अगर वही चेतना हर हृदय में है, तो फिर खोज सिर्फ बाहर की यात्रा नहीं रह जाती।
वह भीतर की यात्रा भी बन जाती है।
इसका मतलब यह नहीं कि हमारे सारे सवाल उसी क्षण खत्म हो जाते हैं।
“मैं कौन हूँ?
”
“ईश्वर है या नहीं?
”
“जीवन का अर्थ क्या है?
”
इन सवालों के जवाब हमेशा एक लाइन में नहीं मिलते।
लेकिन सवाल पूछने का तरीका बदल सकता है।
शायद हमें हर उत्तर बाहर खोजने के बजाय कभी-कभी अपने भीतर भी देखना चाहिए।
मुझे इससे क्या सीखना है?
जिसे मैं बाहर खोज रहा हूँ, हो सकता है उसकी कोई झलक मेरे भीतर भी मौजूद हो।
अब मुझे क्या करना है?
आज कुछ मिनट बिना किसी फोन, शोर या जल्दबाजी के शांत बैठना है।
कुछ हासिल नहीं करना।
कुछ साबित नहीं करना।
बस अपने भीतर उठ रहे विचारों को देखना है।
और खुद से पूछना है—
“मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?
”
श्रीमद्भगवद्गीता
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “क्या ईर्ष्या को सिर्फ बुरी भावना मानकर दबा देना चाहिए?
अगर किसी दूसरे की सफलता देखकर मुझे लगता है कि मैं भी अपने जीवन में कुछ करना चाहता हूँ, तो क्या इस भावना को अपने लिए सकारात्मक दिशा में इस्तेमाल किया जा सकता है?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — समर्थ को दोष नहीं लगता, जैसे सूर्य, अग्नि और गंगा — किंतु यही सोच अहंकार बन जाए तो पतन निश्चित है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “मेरे दोस्त की सफलता देखकर मैं उसके लिए खुश होना चाहता हूँ, लेकिन सच कहूँ तो अंदर से जलन होती है। फिर मुझे अपने ही इस भाव पर शर्म आती है क्योंकि मैं उसके खिलाफ कुछ चाहता भी नहीं। मैं इस भावना को कैसे समझूँ?”
- “कभी-कभी लगता है कि मैं जितनी मेहनत करता हूँ, उतनी मेहनत के बिना ही दूसरे लोग मुझसे आगे निकल जाते हैं। फिर मन में गुस्सा और तुलना दोनों शुरू हो जाते हैं। मैं बार-बार दूसरों की जिंदगी से अपनी जिंदगी को क्यों नापता हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
