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मेरी जिंदगी के सबसे मुश्किल समय में कुछ लोग बिना किसी स्वार्थ के मेरे साथ खड़े रहे। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उनके बिना शायद मैं उस समय संभल नहीं पाता। मैं उनका आभार ऐसे कैसे व्यक्त करूँ कि उन्हें सच में महसूस हो कि उन्होंने मेरे लिए क्या किया?

श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।47।।

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stvakarmaṇi

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47

चौपाई / दोहा

जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥

jaki rahi bhavana jaisi, prabhu murati dekhi tina taisi

अर्थ

जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है। बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।

श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड

कथा

कच और देवयानी: जब प्यार का जवाब प्यार न हो

कच देवताओं के गुरु बृहस्पति के पुत्र थे।

वे शुक्राचार्य के पास एक विशेष विद्या सीखने गए थे मृत संजीवनी विद्या।

देवताओं के लिए यह विद्या बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि असुर अपने मृत योद्धाओं को फिर से जीवित कर लेते थे।

कच वहां शिक्षा लेने लगे।

इसी दौरान शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को कच से प्रेम हो गया।

लेकिन कच का उद्देश्य कुछ और था।

वे वहां विद्या सीखने आए थे।

असुरों को यह बात पसंद नहीं थी।

उन्होंने कच को कई बार मार डाला।

लेकिन हर बार देवयानी के आग्रह पर शुक्राचार्य ने उन्हें फिर जीवित किया।

समय बीतता गया।

कच ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली।

अब देवयानी ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।

कच के लिए यह आसान क्षण नहीं था।

वह देवयानी का अपमान नहीं करना चाहते थे।

लेकिन वह ऐसा वचन भी नहीं देना चाहते थे जिसे वह निभा नहीं सकते।

उन्होंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया।

उनका तर्क था कि शुक्राचार्य ने उन्हें अपने पुत्र के समान माना और उन्हें शिक्षा दी।

इसलिए देवयानी उनके लिए बहन के समान थीं।

देवयानी को यह अस्वीकार बहुत गहरा लगा।

जिस व्यक्ति के लिए उन्होंने इतना कुछ किया था, वही अब उनके प्रेम को स्वीकार नहीं कर रहा था।

दुख धीरे-धीरे क्रोध में बदल गया।

उन्होंने कच को श्राप दिया कि जो विद्या उन्होंने सीखी है, वह उनके अपने काम नहीं आएगी।

कच ने उस श्राप को स्वीकार किया।

उन्होंने कहा कि वह विद्या भले उनके लिए सीधे उपयोगी हो, लेकिन वे उसे अपने शिष्यों को सिखा सकते हैं और उसके माध्यम से उसका उद्देश्य पूरा हो सकता है।

यह कहानी प्रेम के बारे में जितनी है, उतनी ही अस्वीकृति के बारे में भी है।

किसी को प्यार करना हमारे हाथ में है।

लेकिन सामने वाला उसी तरह प्यार करे यह हमारे हाथ में नहीं।

यही बात स्वीकार करना सबसे कठिन होती है।

हम सोचते हैं

"मैंने उसके लिए इतना किया।

"

"मैंने उसका इतना साथ दिया।

"

"फिर उसने मुझे क्यों नहीं चुना?

"

लेकिन प्रेम कोई लेन-देन नहीं है।

किसी के लिए बहुत कुछ करने से यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह हमें उसी रूप में चाहे।

और दूसरी तरफ, किसी को प्रेम स्वीकार करना भी अपने आप में क्रूरता नहीं है अगर वह बात सम्मान और ईमानदारी से कही जाए।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: एकतरफा प्यार, अस्वीकृति

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “मेरी जिंदगी के सबसे मुश्किल समय में कुछ लोग बिना किसी स्वार्थ के मेरे साथ खड़े रहे।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उनके बिना शायद मैं उस समय संभल नहीं पाता।

मैं उनका आभार ऐसे कैसे व्यक्त करूँ कि उन्हें सच में महसूस हो कि उन्होंने मेरे लिए क्या किया?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है जिसकी जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही दिखाई देता है।

बाहर बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलनी होती है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है किसी का मुझे प्यार करना मेरी कीमत तय नहीं करता।

और अगर मुझे किसी के प्रेम का जवाब उसी तरह नहीं देना है, तो झूठी उम्मीद देने से बेहतर है कि मैं सम्मान के साथ सच बोलूं।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

किसी का मुझे प्यार न करना मेरी कीमत तय नहीं करता। और अगर मुझे किसी के प्रेम का जवाब उसी तरह नहीं देना है, तो झूठी उम्मीद देने से बेहतर है कि मैं सम्मान के साथ सच बोलूं।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक