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जब किसी सफल इंसान की कहानी सुनता हूँ तो कुछ समय के लिए बहुत जोश आता है। लगता है कि अब मैं भी सब बदल दूँगा। लेकिन दो-तीन दिन बाद वही पुरानी आदतें वापस आ जाती हैं। प्रेरणा को सिर्फ कुछ घंटों की भावना बनने से कैसे रोकूँ?
श्लोक
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।66।।
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ
श्रीमद्भगवद्गीता · 18.66
चौपाई / दोहा
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥ पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
Kahi Reechhapati sunu Hanumana, ka chup sadhi raheu balawana. Pawan tanay bal pawan samana, budhi bibek bigyan nidhana. Kavan so kaaj kathin jag maahi, jo nahi hoi tat tumh pahi. Ram kaj lagi tav avatara, sunatahi bhayau parbatakara.
अर्थ
रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान! हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो। इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके? श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।
श्रीरामचरितमानस · Kishkindha Kand, Doha 30
कथा
हरिश्चंद्र: जब सच बोलना आसान न रहे
राजा हरिश्चंद्र की पहचान ही सत्य से जुड़ी थी।
लेकिन किसी सिद्धांत की असली परीक्षा तब नहीं होती जब उसे निभाना आसान हो।
असली परीक्षा तब होती है जब उसी सिद्धांत की कीमत बहुत बड़ी हो जाए।
कथा के अनुसार विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा ली।
हरिश्चंद्र को अपना राज्य छोड़ना पड़ा।
फिर भी उनकी परीक्षा खत्म नहीं हुई।
उन्हें दक्षिणा देनी थी।
राजा के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।
उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र तक को बेच दिया और स्वयं भी दास के रूप में काम करने लगे।
उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका था।
राजमहल से श्मशान तक।
राजा से सेवक तक।
लेकिन उन्होंने अपना वचन नहीं छोड़ा।
फिर कथा का सबसे कठिन क्षण आता है।
उनका पुत्र मर जाता है।
उनकी पत्नी अपने पुत्र का शव लेकर उसी श्मशान में पहुंचती है जहां हरिश्चंद्र काम कर रहे थे।
सोचिए, एक पिता के सामने उसका अपना पुत्र पड़ा है।
पत्नी सामने खड़ी है।
और फिर भी हरिश्चंद्र अपने कर्तव्य के कारण अंतिम संस्कार का शुल्क मांगते हैं।
यह दृश्य किसी भी इंसान को भीतर से हिला देने वाला है।
आखिरकार देवताओं और विश्वामित्र के सामने यह पूरी परीक्षा समाप्त होती है और हरिश्चंद्र को उनका परिवार और राज्य वापस मिलता है।
लेकिन इस कहानी का असली प्रश्न यह नहीं है कि अंत में उन्हें सब वापस मिला।
प्रश्न यह है —
अगर मुझे अपने सिद्धांत की कीमत चुकानी पड़े, तो मैं कितना टिकूंगा?
हम अक्सर कहते हैं — "मैं हमेशा सच बोलता हूं।
"
लेकिन जब सच बोलने से नौकरी जा सकती हो?
जब किसी रिश्ते में समस्या हो सकती हो?
जब अपना नुकसान हो सकता हो?
तब वही बात कठिन हो जाती है।
Linked wisdom: Markandeya Purana / Aitareya Brahmana traditions — citation-level verification required | Evidence: traditional | Topics: सत्य, त्याग, कर्तव्य
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “जब किसी सफल इंसान की कहानी सुनता हूँ तो कुछ समय के लिए बहुत जोश आता है।
लगता है कि अब मैं भी सब बदल दूँगा।
लेकिन दो-तीन दिन बाद वही पुरानी आदतें वापस आ जाती हैं।
प्रेरणा को सिर्फ कुछ घंटों की भावना बनने से कैसे रोकूँ?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — रीछराज जामवंत ने कहा — सुनो हनुमान!
हे बलवान, तुम चुप क्यों बैठे हो?
तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है; तुम बुद्धि, विवेक और ज्ञान के भंडार हो।
इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके?
श्री रामजी के कार्य के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है।
यह सुनते ही हनुमानजी पर्वत के समान विशाल हो गए।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — सिद्धांत की कीमत तभी समझ आती है जब उसे निभाना मुश्किल हो।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
सिद्धांत की कीमत तभी समझ आती है जब उसे निभाना मुश्किल हो।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “सुबह उठते ही कई बार लगता है कि आज कुछ अच्छा करूँगा, लेकिन जैसे ही दिन शुरू होता है वही पुरानी दिनचर्या और थकान वापस आ जाती है। मुझे किसी बड़े मोटिवेशनल भाषण की नहीं, रोज काम करते रहने की असली प्रेरणा चाहिए। वह कहाँ से आएगी?”
- “हालात लगातार खराब हो रहे हैं। पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है। फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है। क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
