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पहले दोस्तों के साथ बैठना, कहीं घूमने जाना या कोई छोटी-सी चीज खरीद लेना भी मुझे खुश कर देता था। अब वही सब करता हूँ लेकिन अंदर से वैसा आनंद नहीं आता। क्या जिंदगी बदल गई है या मेरे अंदर ही कुछ ऐसा बदल गया है कि मैं खुशी महसूस नहीं कर पा रहा?

श्लोक

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः।।36।।

nihatya dhārtarāṣhṭrān naḥ kā prītiḥ syāj janārdana pāpam evāśhrayed asmān hatvaitān ātatāyinaḥ

श्रीमद्भगवद्गीता · 1.36

चौपाई / दोहा

सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥

saba kara mata khaganayaka eha, karia Rama pada pankaja neha

अर्थ

सबका मत यही है — राम के चरणों में प्रेम कीजिए। जब कुछ समझ न आए, तब श्रद्धा ही सबसे सरल रास्ता है।

श्रीरामचरितमानस · उत्तरकाण्ड

कथा

सावित्री: जब सामने मृत्यु हो और फिर भी बातचीत बाकी हो

सावित्री को पहले ही बता दिया गया था कि सत्यवान की आयु बहुत छोटी है।

नारद मुनि ने चेतावनी दी थी कि विवाह के बाद सत्यवान केवल एक वर्ष जीवित रहेगा।

किसी भी व्यक्ति के लिए यह सुनना आसान नहीं।

सावित्री के सामने विकल्प था।

वह चाहती तो पीछे हट सकती थी।

लेकिन उसने सत्यवान को चुना।

उसने सोचा जिंदगी कितनी लंबी होगी, यह मेरे हाथ में नहीं।

लेकिन जिसके साथ जीवन बिताना है, उसका चुनाव मैं कर चुकी हूं।

एक वर्ष बीत गया।

सावित्री को पता था कि वह दिन आने वाला है।

जिस दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, सावित्री भी उनके साथ गईं।

कुछ देर बाद सत्यवान ने कहा कि उनके सिर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है।

वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए।

और फिर उनकी मृत्यु हो गई।

सावित्री ने देखा कि यमराज उनकी आत्मा लेकर जा रहे हैं।

यह वह क्षण था जहां कोई भी टूट सकता था।

लेकिन सावित्री उनके पीछे चल पड़ीं।

यमराज ने कहा

"तुम लौट जाओ।

"

लेकिन सावित्री लौटने को तैयार नहीं थीं।

वह उनके साथ चलती रहीं।

यमराज ने उनकी दृढ़ता देखी और कहा कि पति के प्राणों के अलावा कोई वर मांग सकती हैं।

सावित्री ने एक वर मांगा।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

हर बार उन्होंने ऐसा वर चुना जिसमें उनके परिवार का भविष्य जुड़ा था।

अंत में उन्होंने कहा

"मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों का वर दीजिए।

"

यमराज रुक गए।

क्योंकि यदि सत्यवान जीवित नहीं होंगे, तो यह वर कैसे पूरा होगा?

कहानी के अनुसार, यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े।

लेकिन सावित्री की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं थी कि उन्होंने मृत्यु को रोक दिया।

उनकी ताकत इस बात में थी कि जब सबसे बड़ा दुख सामने आया, तब भी उन्होंने अपना विवेक नहीं खोया।

उन्होंने चिल्लाकर नहीं, सोचकर बात की।

उन्होंने लड़ाई नहीं की।

उन्होंने रास्ता बनाया।

महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Vana Parva — Savitri Upakhyana; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: प्रियजन का जाना, प्रियजन की बीमारी, मृत्यु का भय

स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं

आपका प्रश्न “पहले दोस्तों के साथ बैठना, कहीं घूमने जाना या कोई छोटी-सी चीज खरीद लेना भी मुझे खुश कर देता था।

अब वही सब करता हूँ लेकिन अंदर से वैसा आनंद नहीं आता।

क्या जिंदगी बदल गई है या मेरे अंदर ही कुछ ऐसा बदल गया है कि मैं खुशी महसूस नहीं कर पा रहा?

केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।

इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।

और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है सबका मत यही है राम के चरणों में प्रेम कीजिए।

जब कुछ समझ आए, तब श्रद्धा ही सबसे सरल रास्ता है।

इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है हर संकट को ताकत से नहीं जीता जाता।

कुछ परिस्थितियों में धैर्य, बातचीत और बुद्धि ज्यादा काम करती है।

✦ क्या करें

  • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए विरोध से मन और थकता है।
  • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
  • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
  • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।

✦ क्या न करें

  • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
  • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
  • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
  • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।

जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।

इस अनुभव से एक बात सामने आती है

हर संकट को ताकत से नहीं जीता जाता। कुछ परिस्थितियों में धैर्य, बातचीत और बुद्धि ज्यादा काम करती है।

ऐसे ही कुछ और अनुभव

क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?

यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।

अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।

आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।

हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।

कलश — शुभता का प्रतीक