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पहले मुझे हर चीज के बारे में जानने की इच्छा होती थी। किताब पढ़ता था, नई जगह जाने का मन करता था और किसी भी नई बात पर सवाल पूछता था। अब लगता है कि कुछ नया जानने की इच्छा ही नहीं बची। मेरी यह जिज्ञासा कहाँ चली गई?
श्लोक
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।20।।
na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato 'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre
श्रीमद्भगवद्गीता · 2.20
चौपाई / दोहा
लाभु हानि जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥
labhu hani jivanu maranu jasu apajasu bidhi hatha
अर्थ
लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश — ये सब विधाता के हाथ में हैं। इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।
श्रीरामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड
कथा
एकलव्य: जब दरवाजा बंद हो, तो अपना रास्ता बनाना
एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहता था।
उसकी इच्छा थी कि वह द्रोणाचार्य से शिक्षा ले।
वह उनके पास गया।
लेकिन उसे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।
एकलव्य वापस लौट आया।
लेकिन उसने यह तय नहीं किया कि अब कुछ नहीं हो सकता।
उसने जंगल में द्रोणाचार्य की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई।
फिर उसी प्रतिमा को अपना गुरु मानकर अभ्यास शुरू कर दिया।
हर दिन।
घंटों।
बार-बार।
गलत हुआ तो फिर से।
बाण निशाने से चूका तो फिर से।
धीरे-धीरे उसका अभ्यास उसकी पहचान बन गया।
एक दिन द्रोणाचार्य और उनके शिष्य जंगल में थे।
एक कुत्ता लगातार भौंक रहा था।
कुछ ही देर में उसके मुंह के आसपास कई बाण इस तरह लगे थे कि वह घायल हुए बिना शांत हो गया।
द्रोणाचार्य ने पूछा —
"यह किसने किया?
"
एकलव्य सामने आया।
उसने बताया कि उसने उन्हें अपना गुरु मानकर अभ्यास किया है।
कहानी का अगला हिस्सा कठिन है।
द्रोणाचार्य ने गुरु-दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया।
एकलव्य ने अपना अंगूठा दे दिया।
यह प्रसंग आज भी कई तरह के सवाल खड़े करता है।
क्या यह न्याय था?
क्या एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को उसकी पृष्ठभूमि के कारण रोका जाना उचित था?
क्या गुरु के प्रति समर्पण इतना बड़ा होना चाहिए कि व्यक्ति अपनी क्षमता ही खो दे?
इस कहानी को सिर्फ "त्याग महान है" कहकर खत्म कर देना शायद पर्याप्त नहीं।
क्योंकि इसमें दर्द भी है।
अन्याय भी है।
और एक ऐसे व्यक्ति की मेहनत भी है जिसने रास्ता न मिलने पर अपना रास्ता खुद बनाया।
महाभारत · Linked wisdom: Mahabharata, Adi Parva; needs citation-level verification | Evidence: traditional | Topics: अन्याय, समाज और धर्म, समर्पण
स्वज्ञान विशेषज्ञ आपको सुझाव देते हैं
आपका प्रश्न — “पहले मुझे हर चीज के बारे में जानने की इच्छा होती थी।
किताब पढ़ता था, नई जगह जाने का मन करता था और किसी भी नई बात पर सवाल पूछता था।
अब लगता है कि कुछ नया जानने की इच्छा ही नहीं बची।
मेरी यह जिज्ञासा कहाँ चली गई?
” — केवल आपका नहीं है; यही पीड़ा सदियों से मनुष्य के भीतर रही है।
इसी कारण ऊपर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस की पंक्तियाँ इस अनुभव से जोड़ी गई हैं।
और चौपाई इसी बात को सरल भाषा में दोहराती है — लाभ और हानि, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश — ये सब विधाता के हाथ में हैं।
इन्हें अपने कंधों पर उठाकर मन को मत तोड़िए।
इस अनुभव से एक बात स्पष्ट होती है — दुनिया हमेशा हमें बराबर अवसर नहीं देती।
लेकिन किसी अवसर की कमी को अपनी क्षमता की कमी समझ लेना सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
✦ क्या करें
- • जो हो चुका है, उसे पहले स्वीकार कीजिए — विरोध से मन और थकता है।
- • आज एक छोटा-सा सही कर्म चुनिए, पूरा समाधान एक दिन में नहीं आता।
- • किसी एक भरोसेमंद व्यक्ति से मन की बात कहिए।
- • दिन में कुछ क्षण शांत बैठकर श्वास पर ध्यान दीजिए।
✦ क्या न करें
- • स्वयं को दोष देकर मन को और कमज़ोर मत कीजिए।
- • क्रोध या भय में कोई बड़ा निर्णय अभी मत लीजिए।
- • दूसरों से अपनी परिस्थिति की तुलना मत कीजिए।
- • अकेलेपन में लंबे समय तक मत रहिए।
जिस दिन आप अपनी परिस्थिति को शांत मन से देख पाएँगे, उसी दिन से मार्ग स्वयं खुलने लगेगा। आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक सक्षम हैं।
इस अनुभव से एक बात सामने आती है
दुनिया हमेशा हमें बराबर अवसर नहीं देती। लेकिन किसी अवसर की कमी को अपनी क्षमता की कमी समझ लेना सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
ऐसे ही कुछ और अनुभव
- “मैं रोज वही काम करता हूँ, वही रास्ते, वही लोग और लगभग वही दिनचर्या। कभी-कभी लगता है कि जिंदगी में कुछ नया जानने या खोजने की इच्छा ही खत्म हो गई है। क्या जिज्ञासा उम्र के साथ कम हो जाती है या उसे फिर से जगाया जा सकता है?”
- “हालात लगातार खराब हो रहे हैं। पैसे की चिंता है, घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और कई बार लगता है कि अब कुछ अच्छा होने वाला ही नहीं है। फिर भी अंदर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद बची रहती है। क्या यह उम्मीद रखना सही है या मैं खुद को धोखा दे रहा हूँ?”
क्या यह परिस्थिति आपके जीवन से मिलती है?
यह जगह सलाह देने की नहीं, अपना अनुभव बाँटने की है।
अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पहली बात आपकी हो सकती है।
आपका नाम कहीं नहीं दिखेगा। हर अनुभव गुमनाम रहता है।
हर बात समीक्षा के बाद ही प्रकाशित होती है।
